बुधवार, 24 अप्रैल 2019

पूरे दक्षिण एशिया के लिए उम्मीदें जगाती है अफगान शांति-वार्ता

हाल में अफगानिस्तान में शांति-स्थापना के प्रयासों और अमेरिकी सेना की वापसी से जुड़ी खबरों के बीच 9 फरवरी के ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने एक विस्तृत समाचार प्रकाशित किया है कि अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान में तालिबान ठिकानों पर जबर्दस्त हमला बोला है। माना जा रहा है कि सन 2014 के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है। इन हमलों का उद्देश्य है तालिबान के साथ चल रही शांति-वार्ता में पकड़ अमेरिका के हाथ में रखना। तालिबान को यह भ्रम न रहे कि वे जीत रहे हैं, इसलिए अमेरिका मैदान छोड़कर भाग रहा है। हाल में राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने सालाना ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ भाषण में कहा था कि हम अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने पर विचार कर रहे हैं।

अमेरिका के ताजा हमलों की मार तालिबानी वार्ताकारों के स्वरों में भी सुनाई पड़ रही है। इस वार्ता का संचालन कर रहे अमेरिकी दूत ज़लमय खलीलज़ाद ने हाल में कहा है कि तालिबानियों ने अतीत के अनुभवों से काफी सीख ली है। वे अब अछूत देश बनकर नहीं रहना चाहते। वे यह भी जानते हैं कि इस लड़ाई का सैनिक समाधान सम्भव नहीं है। अफगानिस्तान-अभियान के वर्तमान अमेरिकी सैनिक कमांडर जनरल ऑस्टिन एस मिलर का उद्देश्य तालिबानी ग्रुपों को ज्यादा से ज्यादा तकलीफ पहुँचाना है, ताकि सीधे अमेरिका से बात करने के लिए उनपर दबाव बने।

अफगान सेना की क्षति

पिछले महीने राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कहा था कि उन्होंने सन 2014 में जब से कार्यभार सँभाला है, हमारी सेना के 45,000 सैनिक इस लड़ाई में मारे जा चुके हैं। यह संख्या काफी बड़ी है और अब तक बताई जा रही संख्याओं से कहीं ज्यादा है। अफगानिस्तान में सामान्यतः वसंत के बाद लड़ाई तेज हो जाती है और गर्मियों में जबर्दस्त तरीके से होती है। पिछले साल अगस्त में तालिबान ने गज़नी सूबे पर काफी समय तक अपना कब्जा बनाए रखा था। पर इस बार सर्दियों में ही हमले बोलने के पीछे अमेरिकी रणनीति है कि तालिबान सेना को गर्मियों भर इस नुकसान को पूरा करने में ही लगाए रखा जाए।



पिछले कुछ हफ्तों में अफगानिस्तान की आधिकारिक सेना ने अमेरिकी सेना के साथ मिलकर कंधार, हेलमंड और नंगरहार इलाकों में तालिबानी ठिकानों पर हमले बोले हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग का कहना है कि पिछले कुछ समय में तालिबान को ईरान और रूस से हल्के हथियार और धन भी मिला है, इसलिए दबाव बनाने में दिक्कतें भी पेश आ रहीं हैं। पिछले साल अगस्त में राष्ट्रपति ट्रम्प ने अफगानिस्तान में नई रणनीति पर काम किया था। पर यह रणनीति ढुलमुल रही। इस बीच अफगानिस्तान में अमेरिकी जनरलों में भी फेर-बदल हुआ। अब जनरल मिलर ने तालिबान पर नए हमलों में रिकोनेसां विमानों, तोपखाने, एयर सपोर्ट और अमेरिकी और अफगान कमांडो दस्तों का सहारा लेना शुरू किया है। वे तालिबान समूहों के नेताओं को निशाना बना रहे हैं।

सर्दियों में हमले

सर्दियों में अमेरिकी सेना ने तालिबान पर हमले बोले हैं, तो तालिबान ने भी अफगान सेना की चौकियों और पुलिस स्टेशनों पर हमले बोले हैं। जनवरी के अंतिम सप्ताह में वारदक सूबे के एक इंटेलिजेंस बेस पर तालिबान ने धावा बोला। इसमें दर्जनों अफगान सैनिक मारे गए। अफगान सेना की खुफिया शाखा पर यह सबसे बड़े हमलों में एक था। हालिया वक्त में इस इलाके में इस्लामिक स्टेट की गतिविधियाँ भी बढ़ीं हैं। देश के पूर्वी इलाके की पहाड़ियों पर सन 2015 के बाद से दाएश-समूहों ने कब्जा कर लिया है।

दिसम्बर में अमेरिकी मीडिया ने खबर दी थी कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने पैंटागन से कहा है कि वे अप्रैल तक अफगानिस्तान में सैनिकों की संख्या 14,000 से घटाकर 7,000 कर दें। बाद में अमेरिका सरकार ने इस बात का खंडन भी कर दिया। बहरहाल जो बातचीत चल रही है, उसके अनुसार अमेरिकी सेना की आंशिक वापसी ही होगी। इसके बदले में तालिबान को शासन-व्यवस्था में भाग लेने की अनुमति होगी, पर उन्हें हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा देने की अनुमति नहीं होगी। खलीलज़ाद का कहना है कि हमें उम्मीद है कि इस साल जुलाई में अफगान राष्ट्रपति के चुनाव के पहले ही हम समझौता कर लेंगे। इसके पहले उन्होंने उम्मीद जताई थी कि समझौता अप्रैल तक हो जाएगा।

मॉस्को में भी बातचीत

तालिबान के साथ एक तरफ अमेरिकी दूत बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ रूस के नेतृत्व में एक और स्तर पर बातचीत चल रही है। इस बातचीत के एक दौर में भारतीय प्रतिनिधि भी अनौपचारिक रूप से शामिल हुए थे। इस वार्ता में अफगानिस्तान की काबुल सरकार और चीन तथा पाकिस्तान के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। हाल में 6 फरवरी को मॉस्को में बातचीत का एक दौर पूरा हुआ है, जिसमें करीब 50 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बातचीत में अफगानिस्तान के कई रंगत के राजनीतिक समूह शामिल हो रहे हैं, जबकि अमेरिका के साथ बातचीत सीधे दो पक्षों के बीच हो रही है। इस वार्ता में अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजाई भी शामिल हुए थे। सन 2001 में तालिबान-शासन के पतन के बाद से अफगान नेताओं की इस किस्म की यह पहली मुलाकात थी। मॉस्को वार्ता के बाद करजाई ने कहा था कि यह एक लम्बी प्रक्रिया है। अभी हम पहले दो-तीन छोटे कदमों की बात ही कर रहे हैं।

मॉस्को की वार्ता से यह बात भी उजागर हुई है कि अमेरिकी फैसले के बरक्स इस इलाके के दूसरे देशों ने अपनी भावी रणनीति पर विचार शुरू कर दिया है। खासतौर से रूस और चीन ने तालिबान के साथ अपने रिश्ते बेहतर बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। इस पूरी बातचीत में पाकिस्तान की कोशिश अपने महत्व को ज्यादा से ज्यादा स्थापित करने की है। वह एक तरफ यह भी साबित करना चाहता है कि तालिबान अपनी मनमर्जी के मालिक हैं, वहीं यह भी बताना चाहता है कि हम ही उनपर दबाव बना सकते हैं। पाकिस्तान के इस उत्साह के कारण ही भारत ने अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। परम्परा से भारत के रिश्ते अफगानिस्तान के नॉर्दर्न अलायंस के साथ रहे हैं। पर अब भारत को उन तालिबानी समूहों के साथ भी रिश्ते बनाने होंगे, जिनका प्रभाव ईरान से लगी अफगान सीमा पर है।

भारत की दिलचस्पी

अफ़ग़ानिस्तान के नवनिर्माण में पैसा लगाने वाली सबसे बड़ी क्षेत्रीय शक्ति है भारत। वहाँ के संसद भवन का भारत ने निर्माण करके दिया है। एक तरह से यह प्रतीकात्मक लोकतांत्रिक भेंट है। भारत ने साल 2011 में भयंकर सूखे से जूझ रहे अफ़ग़ानिस्तान को ढाई लाख टन गेहूं दिया था। हेरात में सलमा बांध भारत की मदद से बना। यह बांध 30 करोड़ डॉलर (क़रीब 2040 करोड़ रुपये) की लागत से बनाया गया और इसमें दोनों देशों के क़रीब 1500 इंजीनियरों ने अपना योगदान दिया था। भारत ने कंधार में अफ़ग़ान नेशनल एग्रीकल्चर साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी की स्थापना और काबुल में यातायात के सुधार के लिए 1000 बसें देने का भी वादा किया है।

अफगानिस्तान को कराची के विकल्प में बंदरगाह की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए चाबहार बंदरगाह का विकास करने में भी भारत भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान ने अपने सड़क मार्ग से भारतीय माल को अफगानिस्तान भेजने की अनुमति नहीं दी है। इसके विकल्प में भारत चाबहार-ज़ाहेदान रेलवे लाइन भी तैयार कर रहा है। इसके बाद ज़ाहेदान से अफगानिस्तान के ज़रंज तक रेलवे लाइन का विस्तार होगा। भारत के सीमा सड़क संगठन ने अफगानिस्तान में जंरंज से डेलाराम तक 215 किलोमीटर लम्बे मार्ग का निर्माण किया है, जो निमरोज़ प्रांत की पहली पक्की सड़क है। अक्तूबर 2017 में भारत ने चाबहार के रास्ते अफगानिस्तान को गेहूँ की पहली खेप भेजकर इस व्यापार मार्ग की शुरुआत कर भी दी है।

ईरान के रास्ते मध्य एशिया के देशों को जोड़ते हुए रूस तक जाने वाले प्रस्तावित उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर में भी भारत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके अलावा भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण के काफी काम हाथ में ले रखे हैं। उनके सुचारु संचालन के लिए भारत को उन तालिबानी समूहों के साथ रिश्ते बनाने होंगे, जिनका रुख अपेक्षाकृत मित्रवत है। हमें यह नहीं भुलाना चाहिए कि अफगानिस्तान में पाकिस्तान की दिलचस्पी सुरक्षा कारणों से है। वह अफगानिस्तान को अपनी ‘डीप डिफेंस’ योजना का हिस्सा मानता है। पर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हित भी टकराते हैं। दोनों देशों की सीमा बनाने वाली डूरंड लाइन को लेकर दोनों में असहमति है और तालिबानी भी उस असहमति से खुद को अलग नहीं रख सकते।

सांविधानिक-व्यवस्था

एक बड़ा सवाल है कि क्या अमेरिकी सेना अफगान सरकार को मँझधार में छोड़कर चली जाएगी? पाकिस्तानी सेना के विशेषज्ञों को लगता है कि अब तालिबान-शासन की वापसी होगी, क्योंकि उनका देश के काफी बड़े इलाके पर कब्जा है। क्या अफगानिस्तान फिर से मध्ययुग में वापस जाएगा? पर क्या तालिबान समूह कुल मिलाकर एक साथ हैं? मॉस्को में हुई वार्ता में कुछ तालिबान प्रतिनिधियों ने कहा कि हम समावेशी इस्लामी-व्यवस्था चाहते हैं, इसलिए नया संविधान लाना होगा। तालिबानी प्रतिनिधिमंडल के नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकज़ाई ने कहा कि काबुल सरकार का संविधान अवैध है। उसे पश्चिम से आयात किया गया है। हमें इस्लामिक विद्वानों द्वारा तैयार संविधान लागू करना होगा।

दूसरी तरफ इस वार्ता में अफगानिस्तान के नारी-अधिकारवादियों ने भी अपने विचार रखे। तालिबान-प्रतिनिधियों ने उनकी बात सुनी और आश्वस्त किया कि स्त्रियों के साथ न्याय होगा। तालिबान को रूस और चीन के साथ रिश्ते बनाने होंगे, तो कट्टरपंथी प्रवृत्तियों पर भी लगाम लगानी होगी। यह बात कमोबेश पाकिस्तानी समाज पर भी लागू होगी। इसलिए हमें अगले कुछ वर्षों में दक्षिण एशिया के समाज में एक नए वैचारिक-विमर्श की उम्मीद करनी चाहिए, जिसमें कट्टरपंथी, नरमपंथी और प्रगतिशील विचारों के बीच संवाद होगा और टकराव भी।

अफगानिस्तान में काबुल सरकार के भी अंतर्विरोध हैं। अशरफ गनी और हामिद करजाई के विरोधी भी सरकार के भीतर हैं। पश्तून-बहुल अफगानिस्तान में ताजिक, उज्बेक और हाजरा समुदाय भी हैं। इनके अंतर्विरोधों को सुलझने में समय लगेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात उस सूत्र को खोजने की है, जो इन्हें जोड़ता है। इस समाज की कुछ परम्परागत खूबियाँ और साथ ही आधुनिकता को प्रवेश देने की जरूरत भी है। सामरिक दृष्टि से यह इलाका महत्वपूर्ण है, इसलिए कई तरह की ताकतों की इसपर निगाहें हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनय में कोई भी सनातन शत्रु या मित्र नहीं होता। यह नियम हमपर भी लागू होता है।

दक्षिण एशिया में शांति

अफगानिस्तान के आधुनिकीकरण में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, बशर्ते पाकिस्तान भी इसमें दिलचस्पी ले। इसमें पाकिस्तान का भी हित है। अफगानिस्तान से लेकर म्यांमार तक फैले दक्षिण एशिया की सांस्कृतिक-आर्थिक धुरी भारत है। पाकिस्तानी व्यवस्था को भी यह बात समझनी होगी। जिस तरह अफगानिस्तान के विभिन्न जनजातीय और राजनीतिक समूहों को एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना है, उसी तरह इस इलाके के देशों को सह-अस्तित्व के सिद्धांतों को स्वीकार करना होगा।

दक्षिण एशिया के देश जिस तरह हजारों साल से रहते आए हैं, उन्हें वैसे ही रहना चाहिए। औपनिवेशिक शासन समाप्त होने के बाद इस इलाके की नई व्यवस्थाओं ने अपनी स्वाभाविक एकता को पहचानने के बजाय भावनात्मक पहचानों के पीछे भागना शुरू कर दिया है। अफगान-वार्ता इस मायने में उम्मीदें जगाती है।



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