शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

‘ग्लोबल पुलिसमैन’ की भूमिका से क्यों भागा अमेरिका?


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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी मेलानिया इराक में तैनात अमेरिकी सैनिकों को बधाई देने के लिए बुधवार 26 दिसम्बर की रात अचानक इराक जा पहुंचे। राष्ट्रपति के रूप में यह ट्रम्प की पहली इराक यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान बग़दाद के पश्चिम में स्थित एअर बेस पर पत्रकारों से उन्होंने कहा कि अमेरिका ग्लोबल पुलिसमैन की भूमिका नहीं निभा सकता। हमने दुनिया की रखवाली का ठेका नहीं लिया है। दूसरे देश भी जिम्मेदारियों को बाँटें। उन्होंने सीरिया से अपने सैनिकों को वापस बुलाने और बाकी क्षेत्रीय देशों खासकर तुर्की पर आईएस का मुकाबला करने की जिम्मेदारी डालने के अपने फैसले के पक्ष में कहा कि यह ठीक नहीं है कि सारा बोझ हम पर डाल दिया जाए। यों भी अब सीरिया में अमेरिका की जरूरत नहीं है, क्योंकि आईएस को हरा दिया गया है।


डोनाल्ड ट्रम्प ने यह बात खुलकर इस अंदाज में शायद पहले नहीं कही थी, पर वे जब से आए हैं, बार-बार प्रतीकों में इस बात को व्यक्त कर रहे हैं कि सारी दुनिया का दर्द हमारी जिम्मेदारी नहीं है। उन्होंने 20 जनवरी, 2017 को शपथ लेने के बाद कम से कम तीन मामलों में जो पहल की, उनसे उनकी नीतियों का इशारा मिल गया था। सबसे पहले उन्होंने ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीटीपी) संधि से अमेरिका के हटने की घोषणा की। फिर सात मुस्लिम देशों के नागरिकों को वीजा देने पर रोक लगाने के सिलसिले में प्रशासनिक प्रक्रिया शुरू की। इसके अलावा उन्होंने अपने एक और वादे को अमली जामा पहनाते हुए मैक्सिको से लगी सीमा पर दीवार निर्माण और बिना वैध दस्तावेज के वहां रह रहे प्रवासियों के निर्वासन से संबंधित दो कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर कर दिए। तीनों फैसले नकारात्मक थे, पर जाहिर है कि ट्रम्प के चुनावी भाषण कोरी धमकी नहीं थे। 

बोरिया-बिस्तरा समेटा

ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप (टीटीपी) संधि से अमेरिका के हटने की पहल का मतलब था अमेरिका की ग्लोबल उपस्थिति को समेटना। विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रम्प ने जल्दबाजी में चीन को फायदा पहुँचाया, क्योंकि इस समय चीन अपनी उपस्थिति को बढ़ा रहा है। इस संधि को ओबामा प्रशासन की एशिया नीति का सबसे मजबूत कदम माना जाता था। यह समझौता 5 अक्टूबर 2015 को हुआ था। इसका उद्देश्य था इस इलाके में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना। वस्तुतः ट्रम्प की योजना में अमेरिका के आर्थिक हित सर्वोपरि हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव से वह भी परेशान हैं।

ट्रम्प का बयान धमकी के रूप में भी हो सकता है, पर इसकी गहराई पर जाएं, तो समझ में आएगा कि इसका व्यावहारिक अर्थ बहुत व्यापक है। इसका मतलब है कि करीब दो सौ साल से अभेद्य खड़े अमेरिकी दुर्ग में दरारें पड़ने लगीं हैं। इसके कुछ दिन पहले ही उन्होंने सीरिया से वापसी की घोषणा भी की थी। उसके साथ वॉशिंगटन पोस्ट ने खबर दी थी कि अफगानिस्तान से भी अमेरिका अपनी आधी फौजें वापस बुला रहा है। बहरहाल अमेरिकी प्रशासन ने इस खबर का खंडन कर दिया है, पर इस बात को छिपाया नहीं जा सकता कि अमेरिका अब अफगानिस्तान से अपना पिंड छुड़ाना चाहता है। जाहिर है कि अब वह अरबों-खरबों डॉलर खर्च करके दुनियाभर में अपना रसूख बनाए रखने की स्थिति में नहीं है।

सुरक्षा की कीमत

ट्रम्प ने टीटीपी संधि से हटने की घोषणा कारोबारी रिश्तों के संदर्भ में की थी, जिससे उसकी सामरिक महत्ता व्यक्त नहीं होती, पर वे जब सुरक्षा की कीमत शब्द का प्रयोग करते हैं, तब समझ में आता है कि सवाल आर्थिक हैं। सीरिया से हटने की घोषणा उन्होंने अब की है, पर वे इसी साल पहले भी एकबार यह बात कह चुके थे कि हम बहुत-बहुत जल्द सीरिया से हट जाएंगे। तब उन्होंने यह भी कहा था कि सऊदी अरब का आग्रह है कि हम वहाँ जमे रहें, पर हमारा कहना है कि आप ऐसा चाहते हैं, तो इसकी कीमत भी अदा करें। अप्रैल, 2018 में वॉल स्ट्रीट जर्नल ने खबर दी थी कि अमेरिका ने सऊदी अरब, कतर और यूएई से कहा है कि अमेरिकी फौजों की वापसी के बाद वे सीरिया के पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्थिरता कायम करने और अपनी फौजों की तैनाती को सुनिश्चित करना चाहते हैं, तो उन्हें अरबों डॉलर खर्च करने होंगे।

अब उन्होंने जो घोषणा की है, उसके अनुसार यह जिम्मेदारी तुर्की और सऊदी अरब को उठानी है। ट्रम्प ने कहा, हम दूसरे देशों की लड़ाइयाँ लड़ने पर अरबों डॉलर खर्च करते रहे हैं। पश्चिम एशिया में ही हम 2001 से अबतक 7 ट्रिलियन (सात हजार अरब) डॉलर खर्च कर चुके हैं। गौर करें कि भारत की सकल अर्थ-व्यवस्था करीब ढाई ट्रिलियन डॉलर की है। जाहिर है कि अब अमेरिका के पास उतने साधन नहीं बचे हैं कि इतने बड़े स्तर पर लड़ाइयाँ लड़ सके। सीरिया की जिम्मेदारी उन्होंने सऊदी अरब और तुर्की को देने की बात कही जरूर है, पर ये देश भी इतनी बड़ी कीमत देने की स्थिति में नहीं हैं।

ज्यादा बड़ा सवाल अर्थ-व्यवस्था का है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था भले ही मंदी की दिशा में नहीं जा रही है, पर वह लगातार राजनीतिक गलतियों की शिकार हो रही है और उसके बाजारों में दुर्घटनाएं हो रहीं हैं। इससे अर्थ-व्यवस्था की बुनियाद पर चोटें लग रहीं हैं। इससे वैश्विक अर्थ-व्यवस्था में मंदी का खतरा बढ़ रहा है। इस साल अमेरिकी ऑफिस ऑफ गवर्नमेंट एकाउंटेबलिटी (जीएओ) और कांग्रेसनल बजट ऑफिस (सीबीओ) ने देश पर बढ़ते कर्ज (डेट) और संघीय घाटे की और ध्यान खींचा है, जो 2020 तक एक ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा। ऐसे में ग्लोबल पुलिसमैन की भूमिका से भागने वाला बयान महत्वपूर्ण है।

उधर चीन के साथ व्यापार के मोर्चे पर हुए अस्थायी युद्ध विराम के खत्म होने में अभी करीब दो महीने का समय बाकी है। इसके बाद क्या होगा, यह देखना होगा। चीन ने दो साल पहले एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर बैंक की स्थापना की है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा जैसे अमेरिका-मित्र शामिल हो रहे हैं। भारत भी इसका सदस्य है। चीन टीपीपी का सदस्य नहीं था, पर उसने वैकल्पिक संगठन रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) खड़ा कर लिया है। यह आसियान और उसके साथ फ्री-ट्रेड वाले देशों का संगठन है। इसमें भारत, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।

नाफ्टा की विदाई

ट्रम्प ने दिसम्बर के पहले हफ्ते में बताया कि हमने संसद को सूचित कर दिया है कि हम नॉर्थ अमेरिकन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (नाफ्टा) खत्म करना चाहते हैं। इसकी जगह अमेरिका, मैक्सिको और कनाडा के बीच एक नया व्यापार-समझौता हुआ है, जिसे छह महीने के भीतर संसद की स्वीकृति चाहिए। यदि संसद इसकी स्वीकृति नहीं देगी, तो इन तीनों देशों के बीच व्यापार सन 1994 में नाफ्टा बनने के पहले के पहले के नियमों के धार पर चलेगा। देखना यह है कि ट्रम्प के पास नाफ्टा को खत्म करने की शक्ति है भी या नहीं। संसद में अब डेमोक्रेटिक पार्टी बहुमत में आ गई है। ट्रम्प ने मैक्सिको और कनाडा से जो समझौता किया है, उसमें वह संशोधन चाहती है। बहरहाल अंदेशा यह है कि व्यापार समझौतों में इस तरीके से तोड़फोड़ होती रही, तो कनाडा और अमेरिका दोनों देशों में तमाम वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाएंगी, क्योंकि ड्यूटी-फ्री ट्रेड खत्म हो जाएगा। इसके अलावा अमेरिकी कृषि उत्पाद मैक्सिको में बहुत महंगे हो जाएंगे।

बराक ओबामा ने सितम्बर 2016 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा था कि अमेरिका कुछ वैश्विक बंधनों के दायरे में खुद को बाँधने के लिए तैयार है, क्योंकि इससे उसकी सुरक्षा सुनिश्चित होती है। इसपर ट्रम्प ने कहा था, मैं दुनिया के राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं लड़ने जा रहा हूँ। मैं अमेरिकी राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी हूँ। मुझे उसकी ही चिंता रखनी है। उससे पहले 27 अप्रैल को वॉशिंगटन डीसी के सेंटर फॉर द नेशनल इंटरेस्ट में डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका की विदेश नीति दिशाहीन, अविश्वसनीय, निरर्थक और प्रभावहीन रही है। जिस वक्त ट्रम्प यह बात कह रहे थे उनके राष्ट्रपति बनने की कल्पना भी नहीं थी। उन्हें सम्मानित मंचों पर भाषण के लिए भी बहुत कम बुलाया जाता था। उनकी बातों का निचोड़ था कि अमेरिका बेकार का वैश्विक नेता बनने पर साधन खर्च करने के बजाय खुद को मजबूत करने, देश की सैनिक और आर्थिक शक्ति को मजबूत करने और कट्टरपंथी इस्लाम के प्रसार को रोकने का काम करेगा।

भाड़ में गया लोकतंत्र

इस विदेश नीति का सार यह है कि अमेरिका मुक्त व्यापार और गठबंधनों के बजाय रूस और चीन जैसे अधिनायकवादी देशों के साथ दोस्ती करना चाहेगा। जरूरत पड़ी तो उत्तर कोरिया से भी दोस्ती कर लेंगे। जबकि ओबामा लोकतांत्रिक संस्थाओं और मानवाधिकारों के हामी थे। ट्रम्प का शायद इन मूल्यों से बहुत लगाव नहीं है। ट्रम्प ने अपने भाषणों की सफाई में इतना जरूर कहा है कि मैं गठबंधनों के खिलाफ नहीं हूँ, पर उसकी कीमत अमेरिका दे, ऐसा नहीं चाहता। ऐसा नहीं है कि वे अमेरिका की वैश्विक भूमिका से भाग खड़े होंगे, पर इतना जरूर है कि इस भूमिका को वे बदलेंगे जरूर।

जापान और दक्षिण कोरिया में अमेरिकी फौज की तैनाती पर भारी राशि खर्च करने के पक्ष में ट्रम्प नहीं हैं। वे कहते हैं दोनों देश आणविक हथियार धारण करें। यह भी साफ है कि इस्लामिक स्टेट का उदय, आतंकवाद और नाभिकीय अप्रसार उनकी चिंता का विषय है। चीन के साथ उनका टकराव केवल अमेरिकी अर्थ-व्यवस्था के कारण है। वे चीन से होने वाले आयात पर पाबंदियाँ लगाना चाहते हैं। उनकी दिलचस्पी इस बात में जरूर है कि चीन की मदद से उत्तरी कोरिया पर नकेल डाली जाए। इसलिए लगता है कि चीन के साथ उनकी नीति में ठंडा और गरम का मिश्रण रहेगा। भारत के साथ भी कुछ ऐसा ही होगा।

अमेरिका को जब ग्लोबल पुलिसमैन कहा जाता है, तब उसके कई मायने होते हैं। इसका सबसे बड़ा पहलू सामरिक है। दुनिया के हर कोने में आज अमेरिकी फौजें तैनात हैं। कम से कम 38 बड़े फौजी अड्डे और काफी लाखों की तादाद में उसके सैनिक युद्धपोतों पर तैनात दुनिया के कोने-कोने में उपस्थित रहते हैं। उसका यह रसूख आज का नहीं है। सन 1823 में अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने अमेरिकी विदेश नीति के जिन नए सिद्धांतों की घोषणा की थी, उन्होंने अमेरिका को अपने इलाके का और अंततः सारी दुनिया का पुलिसमैन बना दिया। सच है कि वह स्वयंभू पुलिसवाला है, पर यह भी सच है कि उसके साधनों ने उसे यह स्थिति प्रदान की है।

उसकी इस विशेष स्थिति को नकारात्मक और सकारात्मक दोनों अर्थों में देखा जा सकता है। नकारात्मक इसलिए दुनिया के किसी भी इलाके में वह हस्तक्षेप करता है। वियतनाम, सीरिया, इराक और अफगानिस्तान इसके उदाहरण हैं। इसके विपरीत विश्व-स्तर पर कई तरह की आपराधिक-प्रवृत्तियों के खिलाफ कार्रवाई बगैर अमेरिकी मदद के सम्भव नहीं है। पिछले दिनों जब पनामा पेपर्स की जानकारियाँ दुनिया के सामने आईं, तब यही कहा गया था कि आर्थिक अपराधों के खिलाफ अमेरिकी कानूनों और उसकी संस्थाओं की पकड़ इतनी गहरी है कि बगैर उसकी मदद के वैश्विक स्तर कार्रवाई सम्भव नहीं है। आज हम दुनिया में जिस इंटरनेट के प्रताप से जुड़े हुए हैं, वह शुद्ध अमेरिकी सम्पत्ति है। दुनियाभर के देशों में बड़े कारोबारी टैक्सों की चोरी करके छोटे-छोटे देशों में छिपे बैठे रहते हैं, उनकी गर्दनें नापने के लिए अमेरिकी संस्थाओं की जरूरत होती है। वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी संस्थाएं निरंतर सक्रिय रहती हैं। उनके निगाहें केवल हथियारों पर ही नहीं दुनिया की बैंकिंग-प्रणाली पर भी हैं, जो आतंकवादियों को प्राण-वायु उपलब्ध कराती हैं।   







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