
अमेरिका
के डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अपने हजारों सैनिकों को वापस
बुलाने की योजना बनाई है। अमेरिकी मीडिया ने अधिकारियों के हवाले से रिपोर्टों में
बताया है कि महीने भर में 7,000 सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से वापस चले जाएंगे। वॉशिंगटन
पोस्ट के अनुसार जल्द ही ह्वाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ का पद छोड़ने जा रहे जॉन
केली और ह्वाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन सहित ट्रम्प के
वरिष्ठ कैबिनेट अधिकारियों के विरोध के बावजूद इस पर विचार किया जा रहा है। इसके एक दिन पहले ट्रम्प ने सीरिया
से सैनिकों को हटाने की घोषणा की थी। उनके इस फैसले से असहमत रक्षामंत्री जेम्स मैटिस और
एक अन्य उच्च अधिकारी ब्रेट मैकगर्क ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इधर शनिवार 29 दिसम्बर को ह्वाइट हाउस ने कहा है कि राष्ट्रपति ने अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाबत कोई फैसला नहीं किया है।
शायद
ट्रम्प को इस इस्तीफे की उम्मीद थी, क्योंकि मैटिस को फौरन काम से फारिग करने का
फैसला किया गया है। वे शायद फरवरी तक काम करना चाहते थे, पर विदेशमंत्री माइक
पोम्पिओ ने बताया कि उन्हें 31 दिसम्बर तक कार्य-मुक्त कर दिया जाएगा। फिलहाल उप-रक्षामंत्री
पैट्रिक शैनेहन उनकी जगह रक्षामंत्री का काम करेंगे। मैटिस के साथ करीब एक दर्जन
अधिकारी और पैंटागन से हटेंगे, जो मैटिस के कारण आए थे। मैकगर्क सीरिया में आईएस
के खिलाफ बनाए गए वैश्विक गठबंधन में अमेरिका के विशेष दूत थे। ट्रम्प के इस फैसले
का विरोध उनके अपने देश में तो हो ही रहा है, अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया में भी लोग
समझ नहीं पा रहे हैं कि इसका निहितार्थ क्या है। खासतौर से भारतीय विशेषज्ञ
अफ़ग़ानिस्तान को लेकर चिंतित हैं। उन्हें लगता है कि पाकिस्तान समर्थक तालिबान कहीं
फिर से हावी न हो जाएं। अफ़ग़ानिस्तान में रूस और चीन का असर बढ़ने सी सम्भावनाएं भी
हैं।
सीरिया में तुर्की की भूमिका
डोनाल्ड
ट्रम्प ने शनिवार 22 दिसम्बर को तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान को फोन
करके कहा है कि हमारी सेना काफी धीमे और बहुत सावधानी से हटेगी। आठ दिन में दो बार
फोन कॉल का मतलब है कि सीरिया में तुर्की की भूमिका बढ़ेगी, पर ट्रम्प शुरू में
तुर्की पर जितना भरोसा कर रहे थे, उसमें बदलाव आया है। ट्रम्प ने यह फैसला करने के
पहले 14 दिसम्बर को एर्दोगान से लम्बी बातचीत की थी। ट्रम्प का कहना है कि सीरिया
में इस्लामिक स्टेट की पराजय हो चुकी है। उनके प्रशासन के अधिकारियों का कहना है
कि जरूरत पड़ने पर यदि तुर्की ने कार्रवाई की तो हम लॉजिस्टिक्स में उसकी मदद
करेंगे।
अमेरिकी
विशेषज्ञों को इस बात पर संशय है कि तुर्की अपनी सीमा से सैकड़ों किलोमीटर दूर तक
कार्रवाई कर भी पाएगा या नहीं। वहीं अमेरिका के सहयोगी कुर्द तुर्की के हस्तक्षेप
को लेकर परेशान हैं। अंदेशा यह भी है कि कुर्द लड़ाके सीरिया के राष्ट्रपति
बशर-अल-असद के साथ भी जा सकते हैं। तुर्की ने भी स्पष्ट किया है कि हमारी दिलचस्पी
सीरिया की सीमा लगे इलाके में 20 किलोमीटर का बफर जोन बनाने में है। हम ज्यादा
भीतर तक अपनी सेना भेजना नहीं चाहेंगे। ज्यादा भीतर जाने पर कुर्दों के अलावा
बशर-अल-असद की सेना और ईरान समर्थक लड़ाकों से टकराव होने का अंदेशा भी है,
जिन्हें रूस का समर्थन प्राप्त है।
अमेरिकी
अधिकारी मानते हैं कि इस इलाके में देश के बचे-खुचे लोगों को खत्म करने की
जिम्मेदारी तुर्की को दी जानी चाहिए। उसे जरूरत हुई तो हम लॉजिस्टिक्स की मदद
देंगे। अमेरिकी सेना के एक अधिकारी ने वॉलस्ट्रीट जरनल को बताया कि अमेरिकी सेना
120 दिन में वापसी का काम पूरा करना चाहती है। जॉइंट चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल
जो डनफोर्ड ने तुर्की के सेनाध्यक्ष के साथ इस सिलसिले में विचार-विमर्श शुरू कर
दिया है।
अफ़ग़ानिस्तान में क्या होगा?
अफ़ग़ानिस्तान
में 13,329 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से आधे सैनिकों को
वापस बुलाया जा सकता है। राष्ट्रपति पद के
चुनाव-प्रचार के दौरान ट्रम्प ने बार-बार
अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने की बात की थी। अलबत्ता राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने
संकेत दिया कि तालिबान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका अपने सैनिकों को
वहां अनिश्चित समय तक बरकरार रखेगा। उधर अफ़ग़ान सरकार ने जोर देकर कहा है कि हम अमेरिकी
सैनिकों की वापसी को लेकर चिंतित नहीं हैं। राष्ट्रपति के प्रवक्ता हारून चुखानसोरी ने
बीबीसी अफ़ग़ान सर्विस को बताया, "तथ्य यह है कि ये कुछ हज़ार सैनिक हैं जिनकी
भूमिका मुख्य रूप से सलाहकार और तकनीकी सहायता में रही है। उनके जाने से सुरक्षा
की स्थिति पर असर नहीं पड़ेगा।...2014 से ही सुरक्षा मामलों की पूरी ज़िम्मेदारी अफ़ग़ान
सुरक्षाबलों की रही है।"
व्यवहारिक
सच यह भी है कि देश के काफी बड़े हिस्से पर तालिबान का नियंत्रण है। अमेरिका 2001
से ही अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद है। दूसरी तरफ बहुत से राजनयिक मानते हैं कि सन
2001 में तालिबान को पराजित करने में अमेरिकी सेना से ज्यादा बड़ी भूमिका नॉर्दर्न
एलायंस के लड़ाकों की थी, जो काबुल सरकार के साथ हैं। हाल के वर्षों में
अफ़ग़ानिस्तान की सेना अकेले ही रक्षा का काम कर रही है, हालांकि उसपर तालिबान के
हमले हो रहे हैं, पर देश के शहरी इलाकों पर उसका नियंत्रण बना हुआ है। जहाँ तक
अमेरिका का प्रश्न है, वह जानता है कि अफ़ग़ानिस्तान पर दुबारा तालिबान को सत्ता पर
आने मौका नहीं दिया जा सकता। हाँ यदि तालिबान और काबुल प्रशासन के बीच समझौता हो
जाए, तो उसे स्वीकार किया जा सकता है।
अमेरिका
के स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल फॉर अफ़ग़ानिस्तान रिकंस्ट्रक्शन (सिगार) की एक रिपोर्ट
के मुताबिक, अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण पिछले कुछ महीनों में बढ़ा है।
उसकी त्रैमासिक रिपोर्ट के अनुसार अफ़ग़ान सरकार का देश के 55.5 फ़ीसदी इलाके पर
नियंत्रण है। अमेरिका यदि अफ़ग़ानिस्तान से हटेगा, तो तालिबानियों का मनोबल बढ़ेगा।
वे कह सकते हैं कि अमेरिकी हारकर भाग गए। साथ ही इससे अफगान सेना का मनोबल गिरेगा।
तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त हैं। तालिबान को पाकिस्तानी मदरसों में
ट्रेनिंग दी गई है, अन्यथा अफ़ग़ानिस्तान की कबायली संस्कृति में कट्टरपंथी इस्लाम
का तत्व शामिल नहीं था।
भारत की चिंता
बहरहाल
अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तानी प्रभाव बढ़ना भारत के नज़रिए से खतरनाक है। पाकिस्तान
की रणनीति है कि अफ़ग़ानिस्तान को अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाए। सन 1999
में इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण करके आतंकवादी उसे कंधार ले गए थे, जहाँ
तालिबान ने उन्हें पूरा संरक्षण दिया। यह बात भुलाई नहीं जा सकती। भारत के अफ़ग़ानिस्तान के साथ दीर्घकालीन हित
जुड़े हैं। तालिबान की पाकिस्तानी मदरसा पृष्ठभूमि को अलग करके देखें तो पाएंगे कि
अफ़ग़ानिस्तान के साथ हमारे हजारों साल पुराने सांस्कृतिक रिश्ते हैं, जिन्हें तोड़ा
भी नहीं जा सकता। इस वक्त हम वहाँ पुनर्निर्माण के काम में शामिल हैं।
भारत
ने अफ़ग़ानिस्तान में दो अरब डॉलर से ज्यादा का पूँजी निवेश किया है। वहाँ सड़क,
बाँध, रेलमार्ग तथा इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े काफी काम हमारी टीमें वहाँ कर रहीं
हैं। काबुल में संसद की नई इमारत भारत ने बनाकर दी है। हमने ईरान के रास्ते
अफ़ग़ानिस्तान को जोड़ लिया है। यह सम्पर्क उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर के रूप में मध्य
एशिया से होते हुए यूरोप तक जाएगा। सोमवार 24 दिसम्बर को भारतीय कम्पनी इंडिया
पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड ने ईरान में चाबहार के शहीद बेहश्ती बंदरगाह में अपना
दफ्तर खोलकर उसके संचालन का काम शुरू कर दिया है। इस मौके पर भारत, ईरान और
अफ़ग़ानिस्तान के प्रतिनिधि वहाँ जमा हुए। अमेरिका ने ईरान पर लगाई पाबंदियों में
चाबहार बंदरगाह को शामिल नहीं किया है। अफ़ग़ानिस्तान में पुनर्निर्माण के लिए उसने
चाबहार के महत्व को स्वीकार किया है।
अफ़ग़ानिस्तान
इस वक्त अमेरिकी सैनिकों की संख्या उतनी बड़ी नहीं है, जो किसी वक्त हुआ करती थी।
वहाँ से सेना की वापसी की बातें मई 2011 में ओसामा बिन लादेन
की मौत के बाद से शुरू हो गईं थीं। यों सन 2009 में अफ़ग़ानिस्तान में अंतरराष्ट्रीय
सैनिकों की संख्या एक लाख 40 हजार थी। इसमें एक लाख अमेरिकी सैनिक थे। मई 2012 में
नेटो ने अफ़ग़ानिस्तान से हटने की घोषणा की और दिसम्बर 2014 में नेटो की वापसी पूरी
हो गई। मई 2014 में अमेरिका ने भी कहा कि दिसम्बर तक हमारी सेना का काफी बड़ा
हिस्सा बट जाएगा। केवल छोटी सी संख्या में सैनिक वहाँ रहेंगे।
तालिबानी गतिविधियाँ
अंतरराष्ट्रीय
सेना के हटने के बाद से देश में तालिबानी गतिविधियाँ बढ़ीं हैं। हालांकि रक्षा की
काफी जिम्मेदारी अफ़ग़ानिस्तान की नव-गठित सेना ने संभाल ली हैं, पर वह अभी इतनी
संगठित नहीं है कि इतने बड़े देश की रक्षा कर सके। उसके पास न तो बहुत अच्छे उपकरण
हैं, न इस स्तर की ट्रेनिंग है। उसकी वायुसेना भी अभी पूरी तरह तैयार नहीं है। इन
सब कारणों से अभी उसपर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता है। 22 जून, 2015 को
काबुल में संसद भवन पर हमला हुआ। हेलमंड और कुंदुज प्रांतों में अक्सर तालिबानी
लड़ाके हावी हो जाते हैं। इसके बावजूद शहरी इलाकों पर सेना ने अपना नियंत्रण बनाकर
रखा है। हाल में अफ़ग़ानिस्तान संसद के चुनाव सफलता के साथ सम्पन्न हुए, जबकि
तालिबानियों ने घोषणा कर रखी थी कि वे भयंकर मारकाट करेंगे।
अमेरिकी
सेना की वापसी ट्रम्प-प्रशासन के दौर में हो रही है। ट्रम्प की नीति अमेरिका की
वैश्विक गतिविधियों से हाथ खींचने की है। सवाल यह है कि जहाँ उसकी उपस्थिति है,
वहाँ से फौरन वापस नहीं लौटा जा सकता। अफ़ग़ानिस्तान भी ऐसा ही एक इलाका है। इस साल ट्रम्प
प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान में भारत की भूमिका को स्वीकार किया और पाकिस्तान से कहा
कि वह इसमें सहयोग करे। हालांकि पाकिस्तान ने अमेरिका की राय का विरोध किया, पर
हाल में वहाँ के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में शांति
स्थापित करने में भारत की भूमिका हो सकती है।
समझौता-प्रयास
अफ़ग़ानिस्तान
में अंतरराष्ट्रीय कोशिशों के सुपरिणाम भी देखने को मिल रहे हैं। अमेरिकी दूत जलमय
खलीलज़ाद के साथ तालिबान प्रतिनिधियों की बातचीत के कम से कम तीन दौर हो चुके हैं।
यह क्रम इस साल जुलाई से चल रहा है। लम्बे समय से तालिबानी सीधी बातचीत की माँग
करते रहे हैं। तालिबानी सीधे अमेरिका
से बात करना चाहते हैं, वे इस बातचीत में काबुल सरकार को शामिल नहीं करना चाहते।
पर देर-सबेर वे काबुल सरकार से बात करने पर भी सहमत हो गए हैं। यह बात रूस की पहल
पर मॉस्को में हुई बातचीत से जाहिर हुई है। मॉस्को की वार्ता में भारत भी
अनौपचारिक रूप से शामिल हुआ। अफ़ग़ानिस्तान
में संसदीय चुनाव पूरे हो जाने के बाद यह बात साबित हुई कि देश का केन्द्रीय शासन
उतना कमजोर भी नहीं, जितना समझा जा रहा है। विद्रोही तालिबान धड़ों की धमकियों के
बावजूद चुनाव सफलता के साथ संचालित हो गए। चुनावों के ठीक पहले तालिबानी प्रवक्ता
ज़बीउल्ला मुज़ाहिद ने कहा था कि चुनाव संचालित कराने वाले सुरक्षा बलों को निशाना
बनाया जाएगा। उनकी इस धमकी के बावजूद चुनाव ठीक से हो गए, यह सरकारी तंत्र के लिए संतोष की बात है। इससे ज़ाहिर होता है कि देश
की केंद्रीय व्यवस्था को जड़ें जमाने में वक्त लग रहा है, पर सफलता मिल भी रही है। संसदीय चुनाव अगले साल होने वाले राष्ट्रपति
पद के चुनाव के लिए महत्वपूर्ण अभ्यास भी साबित हुए हैं। जनता के मन में चुनाव को
लेकर उत्साह है और सुरक्षा व्यवस्था ठीक रही तो वोटरों की संख्या बढ़ेगी।
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