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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

ओपेक ने तेल में गिरावट रोकी, पर कब तक?

दिसम्बर के पहले सप्ताह में ओपेक और उसके सहयोगी देशों के बीच हर रोज 12 लाख बैरल उत्पादन कम करने पर अंततः सहमति हो गई और इसके बाद तेल की कीमतों में गिरावट रुक गई है। शुक्रवार 7 दिसम्बर को इस समझौते की घोषणा हुई और उसी रोज तेल के वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट खनिज तेल की कीमतें 5.2 फीसदी बढ़कर 63.11 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। ओपेक बैठक में यह फैसला होने के पहले गुरुवार की शाम और शुक्रवार की सुबह तक कीमतों में गिरावट का रुख था। पिछले अक्तूबर से अबतक वैश्विक तेल बाजार में कीमतों में 30 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। गुरुवार की शाम तक नहीं लग रहा था कि उत्पादन कम करने पर सहमति हो पाएगी।

इन गिरती कीमतों को थामने और फिर उन्हें बढ़ाने की कोशिशों में दो रुकावटें थीं। एक तो यह माना जा रहा था कि रूस बहुत कम कटौती करेगा। दूसरी रुकावट ईरान की तरफ से थी। ईरान अपना उत्पादन कम करने को तैयार नहीं था। अमेरिकी पाबंदियों के कारण वह पहले से संकट में है। तेल का उत्पादन कम करने से उसकी अर्थव्यवस्था बिगड़ने का अंदेशा है। अब ओपेक सदस्य देशों ने जो डील किया है, उसके अनुसार ईरान अपना तेल उत्पादन कम नहीं करेगा। ईरान के अलावा ओपेक ने लीबिया, नाइजीरिया और वेनेजुएला को भी छूट दी है। तेल उत्पादन में कटौती करने से इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी संकट में आ जाएंगी। जनवरी के महीने से ओपेक देश अक्तूबर के उत्पादन के बरक्स आठ लाख बैरल का उत्पादन कम करेंगे और गैर-ओपेक देश चार लाख बैरल का। इस फैसले की समीक्षा अप्रैल में की जाएगी।

रविवार, 2 दिसंबर 2018

पेट्रोलियम की गिरती कीमतें और वैश्विक-संवाद


यूरोप में ब्रेक्जिट-विमर्श अपने अंतिम दौर में है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध अब दूसरे दौर में प्रवेश करना चाहता है। भारत जैसे विकासशील देश इंतजार में कि उन्हें किस तरह से इसका लाभ मिले। इधर पेट्रोलियम की कीमतों में गिरावट का रुख अब भी जारी है। हर हफ्ते पाँच से सात फीसदी कीमतें कम हो रहीं है। पिछले साल अक्तूबर से अबतक कीमतें करीब एक तिहाई गिर चुकी हैं। पिछले हफ्ते अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास मध्यावधि वादा बाजार में रेट 50.42 डॉलर हो गए थे। तेल उत्पादक देशों का संगठन ओपेक उत्पादन घटा रहा है और अमेरिका बढ़ा रहा है। ओपेक की कोशिश है कि कीमतें इतनी न गिर जाएं कि संभालना मुश्किल हो जाए।

सऊदी अरब पर अमेरिकी दबाव है कि कीमतों को बढ़ने न दिया जाए। दूसरी तरफ वह रूस के साथ मिलकर कीमतों को गिरने से रोकना चाहता है। अंदेशा इस बात का है कि पेट्रोलियम की माँग घटेगी। यानी कि वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर से मंदी तरफ बढ़ेगी। सऊदी अरब एक तरफ खाशोज्जी हत्याकांड के कारण विवादों से घिरा है, वहीं तेल की कीमतों और अपनी अर्थव्यवस्था की पुनर्रचना के प्रयासों में उसे एक के बाद एक झटके लग रहे हैं।
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