यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के अलगाव यानी ब्रेक्जिट का मसला करीब दो महीने की गहमागहमी के बाद 12 अप्रैल के बजाय 31 अक्तूबर, 2019 तक के लिए टल गया है। अलगाव होना तो 29 मार्च को ही था, पर उससे जुड़े समझौते को लेकर मतभेद इतने प्रबल थे कि वह समय पर नहीं हो पाया और यूरोपीय यूनियन ने उसे 12 अप्रैल तक बढ़ा दिया था। बहरहाल अब यदि 31 अक्तूबर के पहले ब्रिटिश किसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगी, तो अलगाव उससे पहले भी हो सकता है। ब्रसेल्स में 11 अप्रैल को यूरोपीय यूनियन के नेताओं की शिखर वार्ता के बाद इस मसले को छह महीने बढ़ाने का फैसला किया गया, ताकि ब्रिटिश संसद ठंडे दिमाग से कोई फैसला करे। सारा मामला करीब-करीब हाथ से निकल चुका था, पर कॉमन सभा ने अंतिम क्षणों में हस्तक्षेप करके इस अनिश्चय को फिलहाल रोक लिया है।
गत 4 अप्रैल को अंततः एक वोट के बहुमत से संसद ने यह फैसला किया कि ईयू के साथ हुई संधि के अनुच्छेद 50 को लागू करने की तारीख बढ़ाई जाए, ताकि बगैर किसी समझौते के ब्रेक्जिट की सम्भावना को टाला जा सके। इस पूरे मामले में टेरेसा मे की सरकार की फज़ीहत हुई, साथ ही संकटों से निपटने की ब्रिटिश लोकतंत्र की सामर्थ्य पर भी सवाल खड़े हुए हैं। इस मौके पर जरूरत इस बात की थी कि सत्तापक्ष और विपक्ष मिलकर रास्ते निकालते। इस दौरान संसद में तीन बार सरकार की हार हुई, बावजूद इसके कि वह विश्वासमत जीत चुकी थी।
गत 4 अप्रैल को अंततः एक वोट के बहुमत से संसद ने यह फैसला किया कि ईयू के साथ हुई संधि के अनुच्छेद 50 को लागू करने की तारीख बढ़ाई जाए, ताकि बगैर किसी समझौते के ब्रेक्जिट की सम्भावना को टाला जा सके। इस पूरे मामले में टेरेसा मे की सरकार की फज़ीहत हुई, साथ ही संकटों से निपटने की ब्रिटिश लोकतंत्र की सामर्थ्य पर भी सवाल खड़े हुए हैं। इस मौके पर जरूरत इस बात की थी कि सत्तापक्ष और विपक्ष मिलकर रास्ते निकालते। इस दौरान संसद में तीन बार सरकार की हार हुई, बावजूद इसके कि वह विश्वासमत जीत चुकी थी।

