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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

सीरिया में इस्लामिक स्टेट की हार के बावजूद सवाल ही सवाल हैं


सीरिया में इस्लामिक स्टेट के खात्मे का एलान अब सिर्फ औपचारिकता है। पूर्वी सीरिया का अलबाग़ूज़ क़स्बा आइसिस उर्फ आईएस या दाएश का आख़िरी ठिकाना था, जिसपर अब पश्चिमी देशों की सेनाओं का कब्ज़ा हो गया है या हो जाएगा। इस्लामिक स्टेट के सैनिकों और नेताओं ने या तो समर्पण कर दिया है या भाग निकले हैं। बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं। एक तरफ सीरिया में इस्लामिक स्टेट की पराजय की खबरें हैं, वहीं अफगानिस्तान और उत्तरी अफ्रीका में उनके सक्रिय होने के समाचार भी है। चुनौती उस व्यवस्था को कायम करने की है जिसमें इस गिरोह की वापसी फिर से न होने पाए।
अफ़ग़ानिस्तान में गुरुवार 7 मार्च को इस्लामी एकता पार्टी के नेता अब्दुल अली मज़ारी की बरसी के मौक़े पर आयोजित एक सभा में दाएश ने हमला किया। सभा में देश के मुख्य कार्याधिकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला सहित कई राजनीतिक हस्तियां शामिल थीं। शोक सभा स्थल के पास सिलसिलेवार बम धमाकों के कारण बरसी का कार्यक्रम अधूरा छोड़ दिया गया था। इसमें कम से कम 11 लोग मरे और 95 के घायल होने की खबरें हैं। ऐसी खबरें पश्चिम एशिया के कई इलाकों से मिल रहीं हैं।
मित्र देशों की असहमति
उधर पश्चिमी देशों में इस बात पर सहमति नहीं बन पाई है कि पूर्वी सीरिया की सुरक्षा अब कैसे की जाएगी। अमेरिका ने अपने आठ मित्र देशों से कहा था कि वे शुक्रवार 8 मार्च तक इस बात की जानकारी दे दें कि कितनी जिम्मेदारी निभाएंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। इन देशों में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी सबसे प्रमुख हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दिसम्बर में कहा था कि हमारी सेनाएं अब सीरिया से हट जाएंगी। इस घोषणा की अमेरिका के भीतर आलोचना हुई और सेना की फौरी वापसी रुक गई। अब अमेरिका कोशिश कर रहा है कि मित्र देशों के साथ मिलकर कोई व्यवस्था बने। इस व्यवस्था में यूरोप के मित्र देशों के अलावा कुर्दों के नेतृत्व में गठित सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ (एसडीएफ) तथा तुर्की की भूमिका होगी। इसमें भी अड़चन है। तुर्की की नजर में एसडीएफ भी आतंकवादी संगठन है।

शनिवार, 12 जनवरी 2019

सीरिया में रूसी भूमिका भी बढ़ी

अमेरिकी सेना की वापसी की खबरें आने के बाद अब सवाल है कि सीरिया में होगा क्या? सवाल यह भी है कि वहाँ अमेरिकी सेना क्या करने के लिए गई थी? दाएश से लड़ने या राष्ट्रपति बशर अल असद की सरकार का तख्ता पलटने, हिज़्बुल्ला को हराने या कुर्दों का दमन रोकने? डोनाल्ड ट्रम्प का कहना है कि हम तो इस्लामिक स्टेट से लड़ने गए थे। अब वह तकरीबन हार चुका है, इसलिए हम वापस जा रहे हैं। बाकी का काम तुर्की और सऊदी अरब देखेंगे। पर लगता है कि अभी यहाँ काफी काम होना बाकी है। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद इस इलाके में रूस की भूमिका भी बढ़ी है।
सन 2011 में जब अरब देशों में जनांदोलन खड़े हो रहे थे, सीरिया के शासक बशर अल-असद के खिलाफ भी बगावत शुरू हुई। बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल-असद की जगह ली थी। अरब देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था, जिसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया। उन्हीं दिनों इराक में इस्लामिक स्टेट उभार शुरू हुआ, जिसने उत्तरी और पूर्वी सीरिया के काफी हिस्सों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इस लड़ाई में ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़गानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरिया की सेना की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे।

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी वापसी के मायने




अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अपने हजारों सैनिकों को वापस बुलाने की योजना बनाई है। अमेरिकी मीडिया ने अधिकारियों के हवाले से रिपोर्टों में बताया है कि महीने भर में 7,000 सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से वापस चले जाएंगे। वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार जल्द ही ह्वाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ का पद छोड़ने जा रहे जॉन केली और ह्वाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन सहित ट्रम्प के वरिष्ठ कैबिनेट अधिकारियों के विरोध के बावजूद इस पर विचार किया जा रहा है। इसके एक दिन पहले ट्रम्प ने सीरिया से सैनिकों को हटाने की घोषणा की थी। उनके इस फैसले से असहमत रक्षामंत्री जेम्स मैटिस और एक अन्य उच्च अधिकारी ब्रेट मैकगर्क ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इधर शनिवार 29 दिसम्बर को ह्वाइट हाउस ने कहा है कि राष्ट्रपति ने अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाबत कोई फैसला नहीं किया है। 
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