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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

ब्रेक्जिट की भैंस गई पानी में

कॉमन सभा में एक के बाद एक कोशिशों के बावजूद वह तरीका उभरकर नहीं आ रहा है, जिससे ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन का अलगाव ठीक-ठाक तरीके से हो सके। प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने ईयू की सहमति से जो समझौता (ब्रेक्जिट) तैयार किया था, उसे और उसके बाद उसमें सुधार की कोशिशों को संसद बार-बार अस्वीकार करती चली गई, तो आखिरी उम्मीद सोमवार 1 अप्रैल की बैठक में थी, जिसमें कम से कम चार प्रस्ताव ऐसे थे, जिनमें आगे की राह बताई गई थी। यह बैठक भी व्यर्थ हुई। चारों में से एक को भी संसद ने स्वीकार नहीं किया। इनमें कस्टम यूनियन और नॉर्वे जैसी व्यवस्था, ब्रिटेन को सिंगल मार्केट (एक बाज़ार) में बरक़रार रखने पर भी मतदान हुआ, लेकिन किसी भी विकल्प को स्वीकृति नहीं मिली। यह मतदान क़ानूनन बाध्यकारी नहीं था। किसी प्रस्ताव को बहुमत मिल भी जाता तो सरकार उसे मानने के लिए बाध्य नहीं होती, पर उससे रास्ता खुलता।

जिस विकल्प पर निकटतम सहमति बनी, वह यह था कि ब्रिटेन ईयू की कस्टम्स यूनियन में बना रहे। यह प्रस्ताव भी तीन वोट से पराजित हो गया। जिस प्रस्ताव को सबसे ज्यादा वोट मिले, वह था कि इन प्रस्तावों पर जनमत संग्रह करा लिया जाए, पर वह भी 292 के मुकाबले 280 वोटों से गिर गया। सरकार इन दोनों ही प्रस्तावों से असहमत थी। ईयू से हटने के बाद ईयू की कस्टम्स यूनियन में बने रहने का मतलब था व्यापारिक समझौते करने की स्वतंत्रता को खोना। दूसरे प्रस्ताव का मतलब था कि 2016 के इस वायदे से मुकरना कि जनमत संग्रह का फैसला लागू होगा।

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