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सोमवार, 26 अगस्त 2019

अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर विफल पाकिस्तान


पिछले 72 साल में पाकिस्तान की कोशिश या तो कश्मीर को फौजी ताकत से हासिल करने की रही है या फिर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की रही है। पिछले दो या तीन सप्ताह में स्थितियाँ बड़ी तेजी से बदली हैं। कहना मुश्किल है कि इस इलाके में शांति स्थापित होगी या हालात बिगड़ेंगे। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान की आंतरिक और बाहरी राजनीति किस दिशा में जाती है। पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तानी डीप स्टेट का रुख क्या रहता है।
विभाजन के दो महीने बाद अक्तूबर 1947 में फिर 1965, फिर 1971 और फिर 1999 में कम से कम चार ऐसे मौके आए, जिनमें पाकिस्तान ने बड़े स्तर पर फौजी कार्रवाई की। बीच का समय छद्म युद्ध और कश्मीर से जुड़ी डिप्लोमेसी में बीता है। हालांकि 1948 में संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को लेकर भारत गया था, पर शीतयुद्ध के उस दौर में पाकिस्तान को पश्चिमी देशों का सहारा मिला। फिर भी समाधान नहीं हुआ।
चीनी ढाल का सहारा
इस वक्त पाकिस्तान एक तरफ चीन और दूसरी तरफ अमेरिका के सहारे अपने मंसूबे पूरे करना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तानी डिप्लोमेसी को अमेरिका से झिड़कियाँ खाने को मिली हैं। इस वजह से उसने चीन का दामन थामा है। उसका सबसे बड़ा दोस्त या संरक्षक अब चीन है। अनुच्छेद 370 के सिलसिले में भारत सरकार के फैसले के बाद से पाकिस्तान ने राजनयिक गतिविधियों को तेजी से बढ़ाया और फिर से कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण पर पूरी जान लगा दी। फिलहाल उसे सफलता नहीं मिली है, पर कहानी खत्म भी नहीं हुई है।

गत 16 अगस्त को हुई सुरक्षा परिषद की एक बैठक में कोई औपचारिक प्रस्ताव जारी नहीं हुआ, पर पाकिस्तानी कोशिशें खत्म नहीं हुईं हैं। इस बैठक को भी पाकिस्तान अपनी उपलब्धि मानता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जगत में उसकी सुनवाई हुई है। बावजूद इसके कि बैठक में उपस्थित ज्यादातर देशों ने इसे दोनों देशों के बीच का मामला बताया है। यह बैठक अनौपचारिक थी और इसमें हुए विचार का कोई औपचारिक दस्तावेज जारी नहीं हुआ। यह पाकिस्तानी डिप्लोमेसी की पराजय थी। फिर भी इसमें कुछ बातें नई थीं।
यह बैठक चीनी पहल पर हुई थी। बैठक खत्म होने के बाद चीनी दूत ने अपनी प्रेस वार्ता में पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए ऐसा जताने का प्रयास किया कि भारतीय कार्रवाई से विश्व समुदाय चिंतित है। यह चीन सरकार का अपना नजरिया है। चूंकि कोई दस्तावेज जारी नहीं हुआ, इसलिए ज्यादातर बातें बैठक में उपस्थिति राजनयिकों के हवाले से सामने आई हैं। इनमें से कुछ बातें भारत की नजर से महत्वपूर्ण हैं।
वैश्विक समीकरण
बैठक में अमेरिका और फ्रांस ने भारत का साथ दिया और कहा कि अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मामला है, क्योंकि वह देश की सांविधानिक व्यवस्था से जुड़ा है। पर दो बातों पर गौर करें। पहले खबरें थीं कि ब्रिटेन ने इस बैठक में हुए विमर्श पर औपचारिक दस्तावेज जारी करने के चीनी सुझाव का समर्थन किया था। बाद में ब्रिटिश सरकार के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि यह बात सही नहीं है। दूसरे रूसी दूत ने अपने ट्वीट में कुछ ऐसी बातें लिखीं, जिनसे संकेत मिलता है कि उसका परम्परागत रुख बदला है। रूस ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत इस समस्या के समाधान का सुझाव दिया है। हालांकि रूस और भारत के रिश्ते बहुत गहरे हैं, पर एक नए शीतयुद्ध का आग़ाज़ हो रहा है। रूस और चीन करीब आ रहे हैं। रूस की दिलचस्पी अफगानिस्तान में भी है। यूरोप के कई देश आर्थिक कारणों से चीन के करीब जा रहे हैं।
पाकिस्तान के पास कोई विकल्प नहीं है। वह सोशल मीडिया पर उल्टी-सीधी खबरें परोसकर गलतफहमियाँ पैदा करना चाहता है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने अपने स्वतंत्रतादिवस संदेश में यह बात कही भी है। उनकी रणनीति में फिलहाल बदलाव की संभावना नहीं है। अफगानिस्तान में शांति-समझौते की संभावनाओं से वह उत्साहित है। सबको इंतजार इस बात का है कि जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंध हटने के बाद के किस प्रकार के हालात बनेंगे। खबरें हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी दस्ते फिर से जमा हो रहे हैं। पाकिस्तान पर एफएटीएफ के प्रतिबंधों का साया है। वह आतंकी संगठनों को किस हद तक बढ़ावा दे पाएगा, इसे देखना होगा। जम्मू-कश्मीर में यदि अव्यवस्था हुई, तो पाकिस्तान इसका फायदा जरूर उठाएगा। भारत सरकार कश्मीरी नागरिकों के मनोबल को बनाए रखने में सफल होगी या नहीं, यह ज्यादा बड़ा सवाल है।
पाकिस्तानी हुकूमत
पाकिस्तान में इमरान खान के कार्यकाल का एक साल पूरा हो गया है। माना जाता है कि उन्हें वहाँ की सेना ने प्रधानमंत्री बनाया है। इस हफ्ते देश के सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा का कार्यकाल तीन साल के लिए बढ़ा दिया गया है। इमरान खान ने नवाज शरीफ के दौर में जनरल राहील शरीफ का कार्यकाल को बढ़ाए जाने का विरोध किया था। उस वक्त राहील शरीफ ने खुद ही अपना हाथ खींच लिया था। अब कहा जा रहा है कि सुरक्षा के हालात देखते हुए यह फैसला किया गया है। इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। बहुत से फौजी अफसरों की प्रोन्नति के दरवाजे बंद हो गए हैं। बहुत जरूरी है कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति पर नजरें रखी जाएं।
भारतीय दृष्टिकोण से कश्मीर बड़ा मसला है। यह मोदी सरकार की राजनीति की भी बड़ी परीक्षा है। क्या वह वैश्विक मंच पर कश्मीर से जुड़े सवालों का जवाब देने की स्थिति में है? क्या अब भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी बातचीत होगी? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सन 1957 के बाद कश्मीर पर कोई विचार नहीं हुआ। सन 1971 के युद्ध के बाद एकबार कश्मीर का जिक्र हुआ, पर 1972 में शिमला समझौता होने के बाद कई साल तक पाकिस्तान ने चुप्पी रखी।
नब्बे के दशक में पाकिस्तान ने अफ़ग़ान-जेहाद की आड़ में कश्मीर में हिंसा को बढ़ावा दिया और संरा महासभा में कश्मीर का जिक्र फिर से करना शुरू कर दिया। सन 1998 में दोनों देशों ने एटमी धमाके किए, लाहौर यात्रा भी हुई, करगिल हुआ, इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण हुआ, भारतीय संसद पर हमला हुआ और फिर आगरा शिखर सम्मेलन भी हुआ। सन 2003 में दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी रोकने का समझौता हुआ, जिसके कारण माहौल एकदम से बदला।
बात क्यों नहीं होती?
सन 2004 में भारत में यूपीए सरकार बनने के बाद यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी और लगता था कि दोनों देश शांति का कोई फॉर्मूला तैयार कर लेंगे। इसे मुशर्रफ-मनमोहन फॉर्मूला कहा गया, जिसमें अनौपचारिक रूप से इस बात पर सहमति बनने लगी थी कि कोई नई सीमा रेखा नहीं खिंचेगी। नियंत्रण रेखा अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा हो जाएगी। लोगों तथा सामग्रियों का नियंत्रण रेखा के आर-पार मुक्‍त आवागमन होगा। नियंत्रण रेखा पर सड़क मार्ग से आवागमन और व्यापार की शुरुआत भी हो गई।
यह शांति-प्रक्रिया आगे बढ़ती उसके पहले ही नवम्बर, 2008 में मुम्बई पर हमला हो गया। इसके बाद से किसी न किसी रूप में टकराव बढ़ता ही गया है। पाकिस्तान की आंतरिक सत्ता के दो केन्द्र होने की वजह से ऐसा हुआ। क्या इस वक्त सत्ता के दोनों केन्द्र एक पेज पर हैं?  इसका जवाब देना मुश्किल है। बुधवार 14 अगस्त को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाक अधिकृत कश्मीर की असेम्बली के एक विशेष अधिवेशन में कहा, कश्मीर को लेकर युद्ध हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय जिम्मेदार होगा।
इमरान ने कहा, हमने यूएन में याचिका डाली है। अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाएंगेदुनिया के हर मंच पर जाएंगे। हमने दुनिया भर में मौजूद पाकिस्तानी और कश्मीरी समुदाय को इकट्ठा किया है। लंदन में कश्मीर के लिए ऐतिहासिक संख्या में लोग बाहर निकलेंगे। अगले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इतने लोग आपको दिखेंगे जितने पहले कभी नहीं देखे होंगे। सुरक्षा परिषद में भारतीय राजनयिकों ने फौरी तौर पर स्थिति को संभाल लिया है, पर वास्तविक विमर्श अब होगा।
अमेरिका की भूमिका
संरा सुरक्षा परिषद की बैठक के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों से टेलीफोन पर बात की है। अमेरिका फिलहाल अफगानिस्तान को लेकर व्यस्त है। इस वजह से वह पाकिस्तान को हाथ से निकलने नहीं देगा, पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारत से दूरी बनाएगा। भारतीय राजनय के सामने अमेरिका और चीन के अंतर्विरोधों को सुलझाने की जिम्मेदारी भी है।
पाकिस्तान के कारण यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि चीन, भारतीय दृष्टिकोण का समर्थन करेगा। दूसरी तरफ अमेरिका का दृष्टिकोण प्रत्यक्षतः भारत के पक्ष में है, पर दोनों देशों के सामरिक रिश्तों में इन दिनों ठहराव है। यह ठहराव शस्त्रास्त्र की खरीद के कारण है। अमेरिका ने रूस से हवाई रक्षा प्रणाली एस-400 की खरीद पर आपत्ति व्यक्त की है। भारत ने शस्त्रास्त्र की खरीद का दायरा बढ़ाया है। अब हम केवल रूस पर आश्रित नहीं हैं, पर वर्तमान सैन्य उपकरणों में से ज्यादातर रूसी हैं। उन्हें एकदम से बदला नहीं जा सकता।
अमेरिका की हिंद-प्रशांत नीति में भारत की केंद्रीय भूमिका है। चीनी उभार रोकने के लिए जापानऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ चतुष्कोणीय रक्षा सहयोग या क्वाड में भी भारत शामिल है। पर हम हाथ बचाकर चल रहे हैं। क्वाड के लक्ष्य अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच सैनिक समन्वय और सहयोग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण ‘कम्युनिकेशंसकंपैटिबिलिटीसिक्योरिटी एग्रीमेंट (कोमकासा)’ हो जाने के बाद यह साफ हो गया था कि दोनों के रिश्ते काफी गहराई तक जा चुके हैं।
हाल में अमेरिका ने भारत को नेटो सहयोगी के स्तर का दर्जा देने का इरादा जाहिर किया था, पर अमेरिकी संसद ने उस दर्जे को अपेक्षित स्तर से कम ही रखा है। अब दोनों देशों के बीच बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) की चर्चा है, जिसपर पिछले साल सितंबर में दोनों देशों के बीच हुई टू प्लस टू वार्ता में विचार हुआ था। यह समझौता दोनों देशों के सामरिक समझौतों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
अमेरिका के साथ सामरिक सहयोग और उसके अंतर्विरोध पाकिस्तान के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कश्मीर को लेकर वैश्विक संवाद में अमेरिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भारत पूरी तरह अमेरिकी पाले में खड़ा होने से बचता है। यही द्वंद्व सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ईरान के अंतर्विरोधों के रूप में प्रकट होता है। इसे भारतीय राजनय की सफलता कहा जाएगा कि सऊदी अरब और यूएई और यहाँ तक कि इस्लामिक देशों के संगठन ने भी कश्मीर के संदर्भ में ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे भारत विचलित हो।
सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव
कश्मीर में जनमत संग्रह को लेकर बहुत गलतफहमियाँ हैं। मामले को संयुक्त राष्ट्र में भारत लेकर गया था न कि पाकिस्तान। यह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी फोरम पर कभी नहीं उठा। भारत की सदाशयता के कारण पारित सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के एक अंश को पाकिस्तान आज तक रह-रहकर उठाता रहा हैपर पूरी स्थिति को कभी नहीं बताता। 13 अगस्त 1948 के प्रस्ताव को लागू कराने को लेकर वह संज़ीदा था तो तभी पाकिस्तानी सेना वापस क्यों नहीं चली गई?  प्रस्ताव के अनुसार पहला काम उसे यही करना था।
संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव अपनी मियाद खो चुका है और महत्व भी। सुरक्षा परिषद दिसम्बर 1948 में ही मान चुकी थी कि पाकिस्तान की दिलचस्पी सेना हटाने में नहीं है तो इसे भारत पर भी लागू नहीं कराया जा सकता। दूसरे यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 35 के तहत दोनों पक्षों की सहमति से तैयार हुआ था। यह बाध्यकारी प्रस्ताव नहीं है। पाकिस्तान ने अब जो अनुरोध सुरक्षा परिषद से किया है, वह भी अनुच्छेद 35 के तहत है।
जून 1972 के शिमला समझौते की तार्किक परिणति थी कि पाकिस्तान को इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना बंद कर देना चाहिए था। शिमला में औपचारिक रूप से पाकिस्तान ने इस बात को मान लिया कि दोनों देश आपसी बातचीत से इस मामले को सुलझाएंगे। पाकिस्तानी नेताओं ने लम्बे अरसे तक इस सवाल को उठाना बंद रखापर पिछले एक दशक से उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया है।
समाचार एजेंसी रायटर ने 18 दिसम्बर 2003 को परवेज़ मुशर्रफ के इंटरव्यू पर आधारित समाचार जारी कियाजिसमें उन्होंने कहा, ‘हमारा देश संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव कोकिनारे रख चुका है (लेफ्ट एसाइड) और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए आधा रास्ता खुद चलने को तैयार है।’ यह बात आगरा शिखर वार्ता (14-16 जुलाई 2001) के बाद की है।
अमित शाह की घोषणा
संसद में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक पर चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी हमारा है और उसे हमें वापस लेना है। इसके पहले फरवरी 1994 में भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास करकेकहा था कि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहा हैऔर रहेगा तथा उसे देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के किसी भी प्रयास का विरोध किया जाएगा। पाकिस्तान बल पूर्वक कब्जाए हुए क्षेत्रों को खाली करे।
इस प्रस्ताव को पास कराने के पीछे एक उद्देश्य राष्ट्रीय आमराय बनाना था, वहीं अमेरिका सरकार की एक मुहिम को अस्वीकार करना था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कश्मीर को अलग स्वतंत्र देश बनाने की एक योजना बनाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की 1994 की अमेरिका यात्रा के पहले ही भारतीय संसद का यह प्रस्ताव पास हो गया।
दूसरी तरफ व्यावहारिक सत्य यह भी है कि नियंत्रण रेखा पर आवागमन को स्वीकार करके एक प्रकार से भारत सरकार ने उधर के कश्मीर के अस्तित्व को स्वीकार करना शुरू कर दिया था। 13 अप्रैल 1956 को जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, “मैं मानता हूँ कि युद्ध विराम रेखा के पार का इलाका आपके पास रहे। हमारी इच्छा लड़ाई लड़कर उसे वापस लेने की नहीं है।
भारत की वर्तमान कश्मीर नीति में अभी और आक्रामकता देखने को मिलेगी। यही आक्रामकता नाभिकीय शस्त्रों से जुड़े नो फर्स्ट यूज़ सिद्धांत के साथ जुड़ी है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का बयान अनायास नहीं आया है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान इस मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण से कुछ हासिल करने में सफल होगा? उसे चीनी समर्थन मिलने के बावजूद लगता नहीं कि उसे सफलता मिलेगी। चीन ने भी दोनों सीधी बातचीत से विवाद को सुलझाने का सुझाव दिया है।
पाकिस्तानी नेताओं के उन्मादी बयान अपने देश की जनता को भरमाने के लिए भी हैं। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने इस बात को अपने संपादकीय में स्वीकार किया है। अखबार ने लिखा है, दुनिया ने पाकिस्तान की गुहार पर वैसी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, जिसकी उम्मीद थी, बल्कि अमेरिका और यूएई ने तो भारत की इस बात को माना है कि यह उसका आंतरिक मामला है।
इमरान खान के उन्मादी भाषण के अलावा भी खबरें हैं कि पाकिस्तान ने स्कर्दू हवाई अड्डे पर उपकरणों को पहुँचाना शुरू कर दिया है। खबरें यह भी हैं कि उसने वहाँ अपने जेएफ-17 विमान तैनात किए हैं। अपनी पश्चिमी सीमा से सैनिकों को हटाकर पूर्वी सीमा पर लाना शुरू कर दिया है वगैरह। पर वास्तव में पाकिस्तान की स्थिति इस समय सैनिक कार्रवाई करने की नहीं है। सारा शोर-शराबा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अपने देश की जनता का ध्यान खींचने के लिए है।

शनिवार, 4 मई 2019

मसूद अज़हर पर चीनी अड़ंगा हटने से हालात बदलेंगे

चीन ने मसूद अज़हर के मामले पर सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव पर लगाई अपनी आपत्ति हटा ली है। इसके बाद मसूद अज़हर अब घोषित आतंकवादी है। चीन-भारत रिश्तों के लिहाज से यह महत्वपूर्ण घटना है साथ ही पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों पर भी इसका असर पड़ेगा। इमरान खान की हाल की चीन यात्रा के दौरान शी चिनफिंग ने इस बात की उम्मीद जाहिर की कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में सुधार होगा। दक्षिण एशिया की प्रगति और विकास के लिए यह जरूरी भी है। दक्षिण एशिया के देशों के बीच सम्पर्क तबतक ठीक नहीं होगा, जबतक भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बेहतर नहीं होंगे। फरवरी में पुलवामा कांड के बाद चीन ने अपने उप विदेश मंत्री शुआनयू को पाकिस्तान भेजा था, ताकि तनाव बढ़ने न पाए। चीन को लेकर भारत में एक खास तरह की चिंता हमेशा रहती है। पकिस्तान के प्रति उसका झुकाव बी जाहिर है। क्या वह अपने इस झुकाव को कम करेगा? क्या वह संतुलन स्थापित करेगा? लोकसभा चुनाव के बाद ऐसे सवाल फिर से विमर्श का विषय बनेंगे।

इस बीच चीन ने अरबों डॉलर की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना से बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे को हटा दिया है। बीसीआईएम को हटाए जाने के कारणों के बारे में तत्काल कुछ नहीं बताया गया है, लेकिन अप्रैल के अंतिम सप्ताह में आयोजित बेल्ट एंड रोड फोरम के दूसरे शिखर सम्मेलन में जारी सूची में जिन परियोजनाओं का जिक्र किया गया है, उनमें इस गलियारे का उल्लेख नहीं है। भारत ने बेल्ट एंड रोड के तहत बन रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करते हुए इस कार्यक्रम से अपनी दूरी बना रखी है और इसके दूसरे सम्मेलन में भी उसने भाग नहीं लिया। अनुमान लगाया जा सकता है कि इस विरोध की खीझ में चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे (बीसीआईएम) को लिस्ट से बाहर कर दिया है।

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

आतंकी संगठनों पर नकेल डालने में क्या कामयाब होगा पाकिस्तान?


पुलवामा कांड के बाद से पाकिस्तान पर अपने उन कट्टरपंथी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव है, जो संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल हैं। पिछले महीने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक में भी पाकिस्तान से कहा गया था कि वह जल्द से जल्द कार्रवाई करे, वरना उसका नाम काली सूची में डाल दिया जाएगा। इन दबावों के कारण सोमवार 4 मार्च को पाकिस्तान सरकार ने उन सभी संगठनों की सम्पत्ति पर कब्जा करने की घोषणा की है, जिनके नाम संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में हैं। इसके बाद भारत ने संकेत दिए हैं कि इन कदमों के मद्देनज़र हम फौजी कार्रवाई के इरादे को त्याग रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (प्रतिबंध और ज़ब्ती) आदेश, 2019 पाकिस्तान के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अधिनियम, 1948 के तहत है। इन संगठनों से जुड़े सभी धर्मादा (दातव्य) संगठनों की सम्पदा भी सरकारी कब्जे में चली जाएगी। जैश के चीफ मसूद अज़हर पर कोई कार्रवाई होगी या नहीं, अभी यह स्पष्ट नहीं है। इसकी वजह यह है कि संरा सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध परिषद के प्रस्ताव 1267 में उनका नाम नहीं है। पाकिस्तान के विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने इस आदेश की जानकारी पत्रकारों को देते हुए बताया कि यह आदेश संरा सुरक्षा परिषद और पेरिस स्थित एफएटीएफ के निर्देशों के अनुरूप है।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

लाहौर में इस साल भी नहीं मनेगा बसंत, पर चर्चा जरूर है


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जिस तरह भारत में सांस्कृतिक सवालों पर आए दिन धार्मिक कट्टरता के सवाल उठते हैं तकरीबन उसी तरह पाकिस्तान में भी उठते हैं। दक्षिण एशिया के समाज में तमाम उत्सव और समारोह ऐसे हैं, जो धार्मिक दायरे में नहीं बँधे हैं। वसंत पंचमी या श्रीपंचमी ऐसा ही मौका है, जो ऋतुओं से जुड़ा है। इसे भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है। पीला या बसंती रंग इसकी पहचान है और इसे मनाने के अलग-अलग तरीके हैं। पंजाब में बसंत के दिन पतंगे उड़ाने की परम्परा है। विभाजन के बाद भी यह परम्परा चली आ रही है, पर पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान बसंत के उत्सव पर रोक लगी हुई है। वहाँ की पंजाब सरकार ने पतंगबाजी से पैदा होने वाले खतरों को लेकर इसपर रोक लगा रखी है, पर काफी लोग मानते हैं कि इस त्योहार की हिन्दू पहचान को लेकर सवालिया निशान खड़े हुए थे, जो पाबंदी की असली वजह है।  

भारत में मुगल बादशाहों ने बसंत को सांस्कृतिक रूप से स्वीकार किया था और उसे बढ़ावा दिया था। मुग़ल काल की मिनिएचर पेंटिंग में बसंत-उत्सव की झलक मिलती है। महाराजा रंजीत सिंह ने अपने दौर में बसंत के दौरान दस दिन की छुट्टी घोषित कर रखी थी। उनके सैनिक इस दौरान पीले रंग के वस्त्र पहनते थे। बँटवारे के बाद पाकिस्तानी पंजाब में भी पतंग उड़ाने का रिवाज़ बना रहा। बल्कि हुआ यह कि अस्सी के दशक में भारत के मुकाबले पाकिस्तानी समाज में पतंगबाजी ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर गई। इसकी एक वजह शायद पाकिस्तानी समाज के अंतर्विरोध थे। वह ज़ियाउल हक़ का दशक भी था, जब साहित्य, कला और संस्कृति को धार्मिक-दृष्टि से देखना शुरू हुआ। मनोरंजन पर पाबंदियाँ लगीं, जिसमें फ़िल्म और रंगमंच भी शामिल थे। सैनिक सरकार और पाबंदियों के उस दौर में लोगों को मनोरंजन और तफरीह का एक रास्ता बसंत की शक्ल में नजर आया। इसके केन्द्र में थी, पतंगबाजी।

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

नवाज़ शरीफ़ की जेल-यात्राएं और पाकिस्तानी लोकतंत्र




पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को फिर से जेल के सीखचों के पीछे भेज दिया गया है। भ्रष्टाचार निरोधी एक अदालत (नेशनल एकाउंटेबलिटी ब्यूरो या एनएबी) ने अल-अज़ीज़िया स्टील मिल्स मामले में सात साल की सज़ा सुनाई है। फ्लैगशिप इन्वेस्टमेंट वाले एक और मामले में उन्हें बरी कर दिया गया है। इससे पहले, जुलाई में एक अन्य मामले में कोर्ट ने नवाज़ शरीफ़, उनकी बेटी और दामाद को सज़ा सुनाई थी और जेल भेज दिया था। बाद में एक अदालती फैसले के कारण वे जेल से बाहर आ गए, पर अब फिर से उन्हें जेल जाना पड़ा है। उनके अलावा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ अली ज़रदारी पर भी जेल-यात्रा का खतरा मंडरा रहा है।

शनिवार, 24 नवंबर 2018

पाकिस्तान का आर्थिक संकट और कट्टरपंथी आँधियाँ


पाकिस्तान इस वक्त दो किस्म की आत्यंतिक परिस्थितियों से गुज़र रहा है। एक तरफ आर्थिक संकट है और दूसरी तरफ कट्टरपंथी सांप्रदायिक दबाव है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल में जब तौहीन-ए-रिसालत यानी ईश-निंदा के एक मामले में ईसाई महिला आसिया बीबी को बरी किया, तो देश में आंदोलन की लहर दौड़ पड़ी थी। आंदोलन को शांत करने के लिए सरकार को झुकना पड़ा। दूसरी तरफ उसे विदेशी कर्जों के भुगतान को सही समय से करने के लिए कम से कम 6 अरब डॉलर के कर्ज की जरूरत है। जरूरत इससे बड़ी रकम की है, पर सऊदी अरब, चीन और कुछ दूसरे मित्र देशों से मिले आश्वासनों के बाद उसे 6 अरब के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की शरण में जाना पड़ा है।

गुजरे हफ्ते आईएमएफ का एक दल पाकिस्तान आया, जिसने अर्थव्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों और संसद सदस्यों से भी मुलाकात की और उन्हें काफी कड़वी दवाई का नुस्खा बनाकर दिया है। इस टीम के नेता हैरल्ड फिंगर ने पाकिस्तानी नेतृत्व से कहा कि आपको कड़े फैसले करने होंगे और संरचनात्मक बदलाव के बड़े कार्यक्रम पर चलना होगा। संसद को बड़े फैसले करने होंगे। इमरान खान की पीटीआई सरकार जोड़-तोड़ करके बनी है। इतना ही नहीं नवाज शरीफ के खिलाफ मुहिम चलाकर उन्होंने सदाशयता की संभावनाएं नहीं छोड़ी हैं। अब उन्हें बार-बार अपने फैसले बदलने पड़ रहे हैं और यह भी कहना पड़ रहा है, ''यू-टर्न न लेने वाला कामयाब लीडर नहीं होता है। जो यू-टर्न लेना नहीं जानता, उससे बड़ा बेवक़ूफ़ लीडर कोई नहीं होता।'' 

रविवार, 15 अप्रैल 2012

असमंजस के दौर में पाकिस्तान



इस शुक्रवार को लाहौर की ज़मिया-मरक़ज़-अल-क़सिया मस्जिद में जुमे की नमाज़ के बाद जमात-उद-दावा या लश्करे तैयबा के चीफ हफीज़ सईद ने कहा, पाकिस्तान और इस्लाम को बचाने के लिए अमेरिका के खिलाफ जेहाद छेड़ दिया गया है। इसी जेहाद की वज़ह से सोवियत संघ टूट गया था और सबको मालूम है कि उस मुल्क का क्या हुआ। और अब अमेरिका की शिकस्त हो रही है। मीडिया एक्सपर्ट और जर्नलिस्टों को अमेरिका की शिकस्त नज़र नहीं आती।मस्जिद के दरवाज़े पर बड़ा सा बक्सा रखा था। बहर जाने वालों से कहा जा रहा था कि जेहाद के लिए पैसा दें। हाल में अमेरिका ने हफीज़ सईद पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है। शायद उसी वजह से या दिखावे के लिए उसके चारों ओर हथियारबंद अंगरक्षक तैनात थे। 
अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर पाकिस्तान सरकार अजब स्थिति में फँस गई है। अमेरिकी घोषणा के बाद से देश में अमेरिका-विरोधी भावनाएं उफान पर हैं। यह विरोध हफीज सईद के बाबत घोषणा के काफी पहले से है। देश की संसद अमेरिका के साथ रिश्तों को परिभाषित करने पर विचार कर रही है। सरकार ने संसद पर जिम्मेदारी डाल दी है। संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी समिति ने गोलमोल बातें शुरू कर दी हैं। अफगानिस्तान सीमा पर अमेरिकी फौजी कार्रवाई के बाद से नेटो की सप्लाई पाकिस्तान के रास्ते बंद पड़ी है। पर यह सप्लाई ग्यारह साल से चल रही थी। पाकिस्तान के सम्मानित विश्लेषक अयाज़ अमीर ने पूछा है कि क्या पाकिस्तान अमेरिका के साथ अपने रिश्ते पूरी तरह तोड़ सकता है? और क्या पाकिस्तान की सेना ऐसा चाहेगी?  उन्होंने लिखा है कि मेरा ख़याल है कि नहीं।
पाकिस्तान सरकार इतनी ताकतवर भी नहीं कि वह अमेरिका के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की तोहमत अपने ऊपर ले। अब ऐसा लगता है कि देश का राजनीतिक वर्ग अमेरिका से रिश्ते तो बनाना चाहता है, पर इस बात को खुलकर कहने से कतराता है। दिफा-ए-पाकिस्तान काउंसिल नाम से 14 कट्टरपंथी संगठनों के समूह ने अमेरिकी झंडे जलाकर अपना गुस्सा ज़ाहिर किया है। काउंसिल ने यह भी कहा है कि राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी को अपनी भारत-यात्रा कैंसिल कर देनी चाहिए। अमेरिका-पाक रिश्तों का क्या भारत-पाक रिश्तों से भी कोई रिश्ता है क्या?ज़रदारी की यात्रा से लगता है कि कोई सम्बन्ध है।
राष्ट्रपति ज़रदारी की यात्रा यों तो निजी कार्यक्रम था, पर उसका सांकेतिक महत्व भी था। वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अतिथि थे और अजमेर शरीफ रवाना होने के पहले उनसे बातचीत भी की। उन्हें पाकिस्तान यात्रा का औपचारिक निमंत्रण दिया, जिसे मनमोहन सिंह ने औपचारिक रूप से स्वीकार किया। ज़रदारी साहब के साथ 47 लोग और भी आए। इनमें देश के गृहमंत्री रहमान मलिक भी थे। सन 2008 के मुम्बई हमले के बाद से भारत-पाकिस्तान के बीच यह सबसे बड़ा सम्पर्क था। भले ही यह अनौपचारिक है, पर महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान में सन 2013 में चुनाव होने हैं, पर हालात बताते हैं कि वहाँ इसी साल अक्टूबर-नवम्बर तक चुनाव हो सकते हैं। संसदीय चुनाव के साथ राष्ट्रपति पद के लिए भी चुनाव होंगे। इन सब बातों का हमारे लिए क्या संदेश है? ज़रदारी की यात्रा की खबरें लीक होने के बाद से लगातार उन पर दबाव है कि वे यात्रा पर न जाएं। पाकिस्तान की कट्टरपंथी तबका ताकतवर होता जा रहा है।
दिफा-ए-पाकिस्तान नाम से जो नया गठबंधन खड़ा हुआ है, वह धीरे-धीरे अल-कायदा की शक्ल लेता जा रहा है। अमेरिका के लिए यह परेशानी का नया सबब है। दूसरी ओर एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में इमरान खान की पाकिस्तान तहरीके इंसाफ नाम की पार्टी इधर बेहद लोकप्रिय हुई है। पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) लगातार चुनाव के लिए दबाव बना रही है। पिछले तीन महीने से अमेरिका के साथ किस प्रकार के रिश्ते कायम किए जाएं, इस बात को लेकर एक संसदीय समिति में बात चल रही है, पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल पा रहा है। कोई भी अमेरिका की पैरवी करने की स्थिति में नहीं है, पर कोई भी यह नहीं कह सकता कि रिश्ते पूरी तरह तोड़ दो। राष्ट्रपति ज़रदारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दबाव है। आर्थिक स्थिति खराब है। अमेरिकी आर्थिक मदद जारी न हुई तो हालात और बिगड़ेंगे। बिजली की स्थिति बिगड़ी हुई है। पेट्रोल और डीजल के दाम प्रति लिटर एक सौ रुपए से ऊपर पहुँच गए हैं। इन हालात के भीतर ही बदलाव की सम्भावनाएं छिपी हैं। कट्टरपंथी अराजकता के पास देश की माली हालत सुधारने का कोई फॉर्मूला नहीं है। 
कट्टरपंथ के खिलाफ देश के भीतर से ही कोई ताकत खड़ी होगी, तभी कोई काम हो पाएगा। हालांकि कट्टरपंथियों के हौसले हाल में बढ़े हैं, पर पिछले एक साल में भारत और पाकिस्तान के रिश्ते सुधरे हैं। मुम्बई मामले के बाद से देश में ऐसी कोई घटना नहीं हुई है, जिसमें आईएसआई का हाथ नज़र आता हो। हाल में उसकी कमान लेफ्टिनेंट जनरल ज़हीरुल इस्लाम के हाथ चली गई है। ऐसा लगता है कि भारत और अमेरिका पाकिस्तान के भीतर एक ऐसे राजनीति वर्ग और सिविल सोसायटी के उदय की कामना कर रहे हैं, जो कट्टरपंथ से लड़ सके। हाल में सोल में हुई न्यूक्लियर समिट में बराक ओबामा, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी और डॉ मनमोहन सिंह के बीच बातचीत हुई है। ज़रदारी की यात्रा किसी बड़े मकसद से नहीं है, पर उसका प्रतीकात्मक महत्व ज़रूर है। सन 2005 के बाद से पाकिस्तान के किसी राष्ट्रपति की यह पहली यात्रा है।
सामने की बातें जो भी हों, पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीति और सेना अमेरिका-विरोधी नहीं है।  इस बात का जवाब कोई नहीं देता कि पाकिस्तानी सेना जिन अमेरिकी हथियारों और साजो-सामान के सहारे देश की रक्षा का दावा करती है, वे अमेरिकी मदद के बगैर कैसे चलेंगे? पाकिस्तान अमेरिका के मुकाबले चीन को अपना बेहतर दोस्त मानता है, पर क्या चीन अमेरिका की भरपाई कर देगा? इस्लामी कट्टरवाद के मामले में चीन का रुख भी पाकिस्तान के खिलाफ हैं। पिछले हफ्ते चीन ने अपने पश्चिमी भूभाग पर सक्रिय उइगुर आतंकवादियों के बारे में विवरण जारी किया है, जिसके अनुसार उन्हें पाकिस्तान के भीतर से समर्थन और हथियार मिलते हैं। चीन ने जिन छह व्यक्तियों के दक्षिण एशिया के एक देश में ट्रेनिंग पाने की जानकारी दी है वह पाकिस्तान ही है। क्या पाकिस्तान उन्हें पकड़वाने में चीन की मदद करेगा? पाकिस्तान ने चीन को अपने विश्वसनीय मित्र के रूप में स्थापित ज़रूर कर लिया है, पर अमेरिका का सहारा छोड़ने की स्थिति में वह कत्तई नहीं है।
इस वक्त पाकिस्तान की अमेरिका-नीति के साथ ही भारत-नीति, अफगानिस्तान-नीति और दूसरे शब्दों में कहें तो पूरी विदेश नीति दाँव पर लगी है। इसके साथ ही सेना और सरकार, सुप्रीम कोर्ट और सरकार तथा संसदीय राजनीति का भविष्य भी दाँव पर है। इस अनिश्चय और असमंजसों की घड़ी में ज़रदारी का यह दौरा दक्षिण एशिया को सकारात्मक रास्ते पर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।  आगरा के दैनिक सी एक्सप्रेस में प्रकाशित

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