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मंगलवार, 3 सितंबर 2019

अमेज़न की आग: इंसानी नासमझी की दास्तान


अमेज़न के जंगलों में लगी आग ने संपूर्ण मानवजाति के नाम खतरे का संदेश भेजा है। यह आग केवल ब्राजील और उसके आसपास के देशों के लिए ही खतरे का संदेश लेकर नहीं आई है। संपूर्ण विश्व के लिए यह भारी चिंता की बात है।  ये जंगल दुनिया के पर्यावरण की रक्षा का काम करते हैं। इन जंगलों में लाखों किस्म की जैव और वनस्पति प्रजातियाँ हैं। अरबों-खरबों पेड़ यहां खड़े हैं। ये पेड़ दुनिया की कार्बन डाई ऑक्साइड को जज्ब करके ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे को कम करते हैं। दुनिया की 20 फीसदी ऑक्सीजन इन जंगलों से तैयार होती है। इसे पृथ्वी के फेफड़े की संज्ञा दी जाती है। समूचे दक्षिण अमेरिका की 50 फीसदी वर्ष इन जंगलों के सहारे है। अफसोस इस बात का है कि यह आग इंसान ने खुद लगाई है। उससे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि हमारे मीडिया का ध्यान अब भी इस तरफ नहीं गया है। 
जंगलों की इस आग की तरफ दुनिया का ध्यान तब गया, जब ब्राजील के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (आईएनईपी) ने जानकारी दी कि देश में जनवरी से अगस्त के बीच जंगलों में 75,336 आग की घटनाएं हुई हैं। अब ये घटनाएं 80,000 से ज्यादा हो चुकी हैं। आईएनईपी ने सन 2013 से ही उपग्रहों की मदद से जंगलों की आग का अध्ययन करना शुरू किया है। कई तरह के अनुमान हैं। पिछले एक दशक में ऐसी आग नहीं लगी से लेकर ऐसी आग कभी नहीं लगी तक।
यह आग इतनी जबर्दस्त है कि ब्राजील के शहरों में इन दिनों सूर्यास्त समय से कई घंटे पहले होने लगा है। देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। आग बुझाने के लिए सेना बुलाई गई है और वायुसेना के विमान भी आकाश से पानी गिरा रहे हैं। फ्रांस में हो रहे जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन में इस संकट पर खासतौर से विचार किया गया और इसके समाधान के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की पेशकश की गई है।
पूरी दुनिया पर खतरा
आग सिर्फ ब्राजील के जंगलों में ही नहीं लगी है, बल्कि वेनेजुएला, बोलीविया, पेरू और पैराग्वे के जंगलों में भी लगी है। वेनेज़ुएला दूसरे नंबर पर है जहां आग की 2600 घटनाएं सामने आई हैंजबकि 1700 घटनाओं के साथ बोलीविया तीसरे नंबर पर है। ब्राजील में आग की घटनाओं का सबसे अधिक प्रभाव उत्तरी इलाक़ों में पड़ा है। घटनाओं में रोराइमा में 141%एक्रे में 138%रोंडोनिया में 115% और अमेज़ोनास में 81% वृद्धि हुई है, जबकि दक्षिण में मोटो ग्रोसो डूो सूल में आग की घटनाएं 114% बढ़ी हैं।

सोमवार, 26 अगस्त 2019

अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर विफल पाकिस्तान


पिछले 72 साल में पाकिस्तान की कोशिश या तो कश्मीर को फौजी ताकत से हासिल करने की रही है या फिर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की रही है। पिछले दो या तीन सप्ताह में स्थितियाँ बड़ी तेजी से बदली हैं। कहना मुश्किल है कि इस इलाके में शांति स्थापित होगी या हालात बिगड़ेंगे। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान की आंतरिक और बाहरी राजनीति किस दिशा में जाती है। पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तानी डीप स्टेट का रुख क्या रहता है।
विभाजन के दो महीने बाद अक्तूबर 1947 में फिर 1965, फिर 1971 और फिर 1999 में कम से कम चार ऐसे मौके आए, जिनमें पाकिस्तान ने बड़े स्तर पर फौजी कार्रवाई की। बीच का समय छद्म युद्ध और कश्मीर से जुड़ी डिप्लोमेसी में बीता है। हालांकि 1948 में संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को लेकर भारत गया था, पर शीतयुद्ध के उस दौर में पाकिस्तान को पश्चिमी देशों का सहारा मिला। फिर भी समाधान नहीं हुआ।
चीनी ढाल का सहारा
इस वक्त पाकिस्तान एक तरफ चीन और दूसरी तरफ अमेरिका के सहारे अपने मंसूबे पूरे करना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तानी डिप्लोमेसी को अमेरिका से झिड़कियाँ खाने को मिली हैं। इस वजह से उसने चीन का दामन थामा है। उसका सबसे बड़ा दोस्त या संरक्षक अब चीन है। अनुच्छेद 370 के सिलसिले में भारत सरकार के फैसले के बाद से पाकिस्तान ने राजनयिक गतिविधियों को तेजी से बढ़ाया और फिर से कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण पर पूरी जान लगा दी। फिलहाल उसे सफलता नहीं मिली है, पर कहानी खत्म भी नहीं हुई है।

गत 16 अगस्त को हुई सुरक्षा परिषद की एक बैठक में कोई औपचारिक प्रस्ताव जारी नहीं हुआ, पर पाकिस्तानी कोशिशें खत्म नहीं हुईं हैं। इस बैठक को भी पाकिस्तान अपनी उपलब्धि मानता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जगत में उसकी सुनवाई हुई है। बावजूद इसके कि बैठक में उपस्थित ज्यादातर देशों ने इसे दोनों देशों के बीच का मामला बताया है। यह बैठक अनौपचारिक थी और इसमें हुए विचार का कोई औपचारिक दस्तावेज जारी नहीं हुआ। यह पाकिस्तानी डिप्लोमेसी की पराजय थी। फिर भी इसमें कुछ बातें नई थीं।
यह बैठक चीनी पहल पर हुई थी। बैठक खत्म होने के बाद चीनी दूत ने अपनी प्रेस वार्ता में पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए ऐसा जताने का प्रयास किया कि भारतीय कार्रवाई से विश्व समुदाय चिंतित है। यह चीन सरकार का अपना नजरिया है। चूंकि कोई दस्तावेज जारी नहीं हुआ, इसलिए ज्यादातर बातें बैठक में उपस्थिति राजनयिकों के हवाले से सामने आई हैं। इनमें से कुछ बातें भारत की नजर से महत्वपूर्ण हैं।
वैश्विक समीकरण
बैठक में अमेरिका और फ्रांस ने भारत का साथ दिया और कहा कि अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मामला है, क्योंकि वह देश की सांविधानिक व्यवस्था से जुड़ा है। पर दो बातों पर गौर करें। पहले खबरें थीं कि ब्रिटेन ने इस बैठक में हुए विमर्श पर औपचारिक दस्तावेज जारी करने के चीनी सुझाव का समर्थन किया था। बाद में ब्रिटिश सरकार के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि यह बात सही नहीं है। दूसरे रूसी दूत ने अपने ट्वीट में कुछ ऐसी बातें लिखीं, जिनसे संकेत मिलता है कि उसका परम्परागत रुख बदला है। रूस ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत इस समस्या के समाधान का सुझाव दिया है। हालांकि रूस और भारत के रिश्ते बहुत गहरे हैं, पर एक नए शीतयुद्ध का आग़ाज़ हो रहा है। रूस और चीन करीब आ रहे हैं। रूस की दिलचस्पी अफगानिस्तान में भी है। यूरोप के कई देश आर्थिक कारणों से चीन के करीब जा रहे हैं।
पाकिस्तान के पास कोई विकल्प नहीं है। वह सोशल मीडिया पर उल्टी-सीधी खबरें परोसकर गलतफहमियाँ पैदा करना चाहता है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने अपने स्वतंत्रतादिवस संदेश में यह बात कही भी है। उनकी रणनीति में फिलहाल बदलाव की संभावना नहीं है। अफगानिस्तान में शांति-समझौते की संभावनाओं से वह उत्साहित है। सबको इंतजार इस बात का है कि जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंध हटने के बाद के किस प्रकार के हालात बनेंगे। खबरें हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी दस्ते फिर से जमा हो रहे हैं। पाकिस्तान पर एफएटीएफ के प्रतिबंधों का साया है। वह आतंकी संगठनों को किस हद तक बढ़ावा दे पाएगा, इसे देखना होगा। जम्मू-कश्मीर में यदि अव्यवस्था हुई, तो पाकिस्तान इसका फायदा जरूर उठाएगा। भारत सरकार कश्मीरी नागरिकों के मनोबल को बनाए रखने में सफल होगी या नहीं, यह ज्यादा बड़ा सवाल है।
पाकिस्तानी हुकूमत
पाकिस्तान में इमरान खान के कार्यकाल का एक साल पूरा हो गया है। माना जाता है कि उन्हें वहाँ की सेना ने प्रधानमंत्री बनाया है। इस हफ्ते देश के सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा का कार्यकाल तीन साल के लिए बढ़ा दिया गया है। इमरान खान ने नवाज शरीफ के दौर में जनरल राहील शरीफ का कार्यकाल को बढ़ाए जाने का विरोध किया था। उस वक्त राहील शरीफ ने खुद ही अपना हाथ खींच लिया था। अब कहा जा रहा है कि सुरक्षा के हालात देखते हुए यह फैसला किया गया है। इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। बहुत से फौजी अफसरों की प्रोन्नति के दरवाजे बंद हो गए हैं। बहुत जरूरी है कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति पर नजरें रखी जाएं।
भारतीय दृष्टिकोण से कश्मीर बड़ा मसला है। यह मोदी सरकार की राजनीति की भी बड़ी परीक्षा है। क्या वह वैश्विक मंच पर कश्मीर से जुड़े सवालों का जवाब देने की स्थिति में है? क्या अब भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी बातचीत होगी? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सन 1957 के बाद कश्मीर पर कोई विचार नहीं हुआ। सन 1971 के युद्ध के बाद एकबार कश्मीर का जिक्र हुआ, पर 1972 में शिमला समझौता होने के बाद कई साल तक पाकिस्तान ने चुप्पी रखी।
नब्बे के दशक में पाकिस्तान ने अफ़ग़ान-जेहाद की आड़ में कश्मीर में हिंसा को बढ़ावा दिया और संरा महासभा में कश्मीर का जिक्र फिर से करना शुरू कर दिया। सन 1998 में दोनों देशों ने एटमी धमाके किए, लाहौर यात्रा भी हुई, करगिल हुआ, इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण हुआ, भारतीय संसद पर हमला हुआ और फिर आगरा शिखर सम्मेलन भी हुआ। सन 2003 में दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी रोकने का समझौता हुआ, जिसके कारण माहौल एकदम से बदला।
बात क्यों नहीं होती?
सन 2004 में भारत में यूपीए सरकार बनने के बाद यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी और लगता था कि दोनों देश शांति का कोई फॉर्मूला तैयार कर लेंगे। इसे मुशर्रफ-मनमोहन फॉर्मूला कहा गया, जिसमें अनौपचारिक रूप से इस बात पर सहमति बनने लगी थी कि कोई नई सीमा रेखा नहीं खिंचेगी। नियंत्रण रेखा अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा हो जाएगी। लोगों तथा सामग्रियों का नियंत्रण रेखा के आर-पार मुक्‍त आवागमन होगा। नियंत्रण रेखा पर सड़क मार्ग से आवागमन और व्यापार की शुरुआत भी हो गई।
यह शांति-प्रक्रिया आगे बढ़ती उसके पहले ही नवम्बर, 2008 में मुम्बई पर हमला हो गया। इसके बाद से किसी न किसी रूप में टकराव बढ़ता ही गया है। पाकिस्तान की आंतरिक सत्ता के दो केन्द्र होने की वजह से ऐसा हुआ। क्या इस वक्त सत्ता के दोनों केन्द्र एक पेज पर हैं?  इसका जवाब देना मुश्किल है। बुधवार 14 अगस्त को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाक अधिकृत कश्मीर की असेम्बली के एक विशेष अधिवेशन में कहा, कश्मीर को लेकर युद्ध हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय जिम्मेदार होगा।
इमरान ने कहा, हमने यूएन में याचिका डाली है। अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाएंगेदुनिया के हर मंच पर जाएंगे। हमने दुनिया भर में मौजूद पाकिस्तानी और कश्मीरी समुदाय को इकट्ठा किया है। लंदन में कश्मीर के लिए ऐतिहासिक संख्या में लोग बाहर निकलेंगे। अगले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इतने लोग आपको दिखेंगे जितने पहले कभी नहीं देखे होंगे। सुरक्षा परिषद में भारतीय राजनयिकों ने फौरी तौर पर स्थिति को संभाल लिया है, पर वास्तविक विमर्श अब होगा।
अमेरिका की भूमिका
संरा सुरक्षा परिषद की बैठक के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों से टेलीफोन पर बात की है। अमेरिका फिलहाल अफगानिस्तान को लेकर व्यस्त है। इस वजह से वह पाकिस्तान को हाथ से निकलने नहीं देगा, पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारत से दूरी बनाएगा। भारतीय राजनय के सामने अमेरिका और चीन के अंतर्विरोधों को सुलझाने की जिम्मेदारी भी है।
पाकिस्तान के कारण यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि चीन, भारतीय दृष्टिकोण का समर्थन करेगा। दूसरी तरफ अमेरिका का दृष्टिकोण प्रत्यक्षतः भारत के पक्ष में है, पर दोनों देशों के सामरिक रिश्तों में इन दिनों ठहराव है। यह ठहराव शस्त्रास्त्र की खरीद के कारण है। अमेरिका ने रूस से हवाई रक्षा प्रणाली एस-400 की खरीद पर आपत्ति व्यक्त की है। भारत ने शस्त्रास्त्र की खरीद का दायरा बढ़ाया है। अब हम केवल रूस पर आश्रित नहीं हैं, पर वर्तमान सैन्य उपकरणों में से ज्यादातर रूसी हैं। उन्हें एकदम से बदला नहीं जा सकता।
अमेरिका की हिंद-प्रशांत नीति में भारत की केंद्रीय भूमिका है। चीनी उभार रोकने के लिए जापानऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ चतुष्कोणीय रक्षा सहयोग या क्वाड में भी भारत शामिल है। पर हम हाथ बचाकर चल रहे हैं। क्वाड के लक्ष्य अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच सैनिक समन्वय और सहयोग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण ‘कम्युनिकेशंसकंपैटिबिलिटीसिक्योरिटी एग्रीमेंट (कोमकासा)’ हो जाने के बाद यह साफ हो गया था कि दोनों के रिश्ते काफी गहराई तक जा चुके हैं।
हाल में अमेरिका ने भारत को नेटो सहयोगी के स्तर का दर्जा देने का इरादा जाहिर किया था, पर अमेरिकी संसद ने उस दर्जे को अपेक्षित स्तर से कम ही रखा है। अब दोनों देशों के बीच बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) की चर्चा है, जिसपर पिछले साल सितंबर में दोनों देशों के बीच हुई टू प्लस टू वार्ता में विचार हुआ था। यह समझौता दोनों देशों के सामरिक समझौतों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
अमेरिका के साथ सामरिक सहयोग और उसके अंतर्विरोध पाकिस्तान के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कश्मीर को लेकर वैश्विक संवाद में अमेरिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भारत पूरी तरह अमेरिकी पाले में खड़ा होने से बचता है। यही द्वंद्व सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ईरान के अंतर्विरोधों के रूप में प्रकट होता है। इसे भारतीय राजनय की सफलता कहा जाएगा कि सऊदी अरब और यूएई और यहाँ तक कि इस्लामिक देशों के संगठन ने भी कश्मीर के संदर्भ में ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे भारत विचलित हो।
सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव
कश्मीर में जनमत संग्रह को लेकर बहुत गलतफहमियाँ हैं। मामले को संयुक्त राष्ट्र में भारत लेकर गया था न कि पाकिस्तान। यह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी फोरम पर कभी नहीं उठा। भारत की सदाशयता के कारण पारित सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के एक अंश को पाकिस्तान आज तक रह-रहकर उठाता रहा हैपर पूरी स्थिति को कभी नहीं बताता। 13 अगस्त 1948 के प्रस्ताव को लागू कराने को लेकर वह संज़ीदा था तो तभी पाकिस्तानी सेना वापस क्यों नहीं चली गई?  प्रस्ताव के अनुसार पहला काम उसे यही करना था।
संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव अपनी मियाद खो चुका है और महत्व भी। सुरक्षा परिषद दिसम्बर 1948 में ही मान चुकी थी कि पाकिस्तान की दिलचस्पी सेना हटाने में नहीं है तो इसे भारत पर भी लागू नहीं कराया जा सकता। दूसरे यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 35 के तहत दोनों पक्षों की सहमति से तैयार हुआ था। यह बाध्यकारी प्रस्ताव नहीं है। पाकिस्तान ने अब जो अनुरोध सुरक्षा परिषद से किया है, वह भी अनुच्छेद 35 के तहत है।
जून 1972 के शिमला समझौते की तार्किक परिणति थी कि पाकिस्तान को इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना बंद कर देना चाहिए था। शिमला में औपचारिक रूप से पाकिस्तान ने इस बात को मान लिया कि दोनों देश आपसी बातचीत से इस मामले को सुलझाएंगे। पाकिस्तानी नेताओं ने लम्बे अरसे तक इस सवाल को उठाना बंद रखापर पिछले एक दशक से उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया है।
समाचार एजेंसी रायटर ने 18 दिसम्बर 2003 को परवेज़ मुशर्रफ के इंटरव्यू पर आधारित समाचार जारी कियाजिसमें उन्होंने कहा, ‘हमारा देश संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव कोकिनारे रख चुका है (लेफ्ट एसाइड) और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए आधा रास्ता खुद चलने को तैयार है।’ यह बात आगरा शिखर वार्ता (14-16 जुलाई 2001) के बाद की है।
अमित शाह की घोषणा
संसद में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक पर चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी हमारा है और उसे हमें वापस लेना है। इसके पहले फरवरी 1994 में भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास करकेकहा था कि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहा हैऔर रहेगा तथा उसे देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के किसी भी प्रयास का विरोध किया जाएगा। पाकिस्तान बल पूर्वक कब्जाए हुए क्षेत्रों को खाली करे।
इस प्रस्ताव को पास कराने के पीछे एक उद्देश्य राष्ट्रीय आमराय बनाना था, वहीं अमेरिका सरकार की एक मुहिम को अस्वीकार करना था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कश्मीर को अलग स्वतंत्र देश बनाने की एक योजना बनाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की 1994 की अमेरिका यात्रा के पहले ही भारतीय संसद का यह प्रस्ताव पास हो गया।
दूसरी तरफ व्यावहारिक सत्य यह भी है कि नियंत्रण रेखा पर आवागमन को स्वीकार करके एक प्रकार से भारत सरकार ने उधर के कश्मीर के अस्तित्व को स्वीकार करना शुरू कर दिया था। 13 अप्रैल 1956 को जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, “मैं मानता हूँ कि युद्ध विराम रेखा के पार का इलाका आपके पास रहे। हमारी इच्छा लड़ाई लड़कर उसे वापस लेने की नहीं है।
भारत की वर्तमान कश्मीर नीति में अभी और आक्रामकता देखने को मिलेगी। यही आक्रामकता नाभिकीय शस्त्रों से जुड़े नो फर्स्ट यूज़ सिद्धांत के साथ जुड़ी है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का बयान अनायास नहीं आया है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान इस मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण से कुछ हासिल करने में सफल होगा? उसे चीनी समर्थन मिलने के बावजूद लगता नहीं कि उसे सफलता मिलेगी। चीन ने भी दोनों सीधी बातचीत से विवाद को सुलझाने का सुझाव दिया है।
पाकिस्तानी नेताओं के उन्मादी बयान अपने देश की जनता को भरमाने के लिए भी हैं। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने इस बात को अपने संपादकीय में स्वीकार किया है। अखबार ने लिखा है, दुनिया ने पाकिस्तान की गुहार पर वैसी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, जिसकी उम्मीद थी, बल्कि अमेरिका और यूएई ने तो भारत की इस बात को माना है कि यह उसका आंतरिक मामला है।
इमरान खान के उन्मादी भाषण के अलावा भी खबरें हैं कि पाकिस्तान ने स्कर्दू हवाई अड्डे पर उपकरणों को पहुँचाना शुरू कर दिया है। खबरें यह भी हैं कि उसने वहाँ अपने जेएफ-17 विमान तैनात किए हैं। अपनी पश्चिमी सीमा से सैनिकों को हटाकर पूर्वी सीमा पर लाना शुरू कर दिया है वगैरह। पर वास्तव में पाकिस्तान की स्थिति इस समय सैनिक कार्रवाई करने की नहीं है। सारा शोर-शराबा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अपने देश की जनता का ध्यान खींचने के लिए है।

रविवार, 11 अगस्त 2019

पाकिस्तान ने 15 अगस्त से मुँह क्यों मोड़ा?


भारत और पाकिस्तान अपने स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। दोनों को स्वतंत्रता दिवस अलग-अलग तारीखों को मनाए जाते हैं। सवाल है कि भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ, तो क्या पाकिस्तान उसके एक दिन पहले आजाद हो गया था? इसकी एक वजह यह बताई जाती है कि माउंटबेटन ने दिल्ली रवाना होने के पहले 14 अगस्त को ही मोहम्मद अली जिन्ना को शपथ दिला दी थी। दिल्ली का कार्यक्रम मध्यरात्रि से शुरू हुआ था।
शायद इस वजह से 14 अगस्त की तारीख को चुना गया, पर व्यावहारिक रूप से 14 अगस्त को पाकिस्तान बना ही नहीं था। दोनों ही देशों में स्वतंत्रता दिवस के पहले समारोह 15 अगस्त, 1947 को मनाए गए थे। सबसे बड़ी बात यह है कि स्वतंत्रता दिवस पर मोहम्मद अली जिन्ना ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा, स्वतंत्र और सम्प्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान का जन्मदिन 15 अगस्त है।
14 अगस्त को पाकिस्तान जन्मा ही नहीं था, तो वह 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाता है? 14 अगस्त, 1947 का दिन तो भारत पर ब्रिटिश शासन का आखिरी दिन था। वह दिन पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस कैसे हो सकता है? सच यह है कि पाकिस्तान ने अपना पहला स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त, 1947 को मनाया था और पहले कुछ साल लगातार 15 अगस्त को ही पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया। पाकिस्तानी स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगाँठ के मौके पर जुलाई 1948 में जारी डाक टिकटों में भी 15 अगस्त को स्वतंत्रता पाकिस्तानी दिवस बताया गया था। पहले चार-पाँच साल तक 15 अगस्त को ही पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था।
अलग दिखाने की चाहत
अपने को भारत से अलग दिखाने की प्रवृत्ति के कारण पाकिस्तानी शासकों ने अपने स्वतंत्रता दिवस की तारीख बदली, जो इतिहास सम्मत नहीं है। पाकिस्तान के एक तबके की यह प्रवृत्ति सैकड़ों साल पीछे के इतिहास पर भी जाती है और पाकिस्तान के इतिहास को केवल इस्लामी इतिहास के रूप में ही पढ़ा जाता है। पाकिस्तान के अनेक लेखक और विचारक इस बात से सहमत नहीं हैं, पर एक कट्टरपंथी तबका भारत से अपने अलग दिखाने की कोशिश करता है। स्वतंत्रता दिवस को अलग साबित करना भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है।

शनिवार, 4 मई 2019

मसूद अज़हर पर चीनी अड़ंगा हटने से हालात बदलेंगे

चीन ने मसूद अज़हर के मामले पर सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव पर लगाई अपनी आपत्ति हटा ली है। इसके बाद मसूद अज़हर अब घोषित आतंकवादी है। चीन-भारत रिश्तों के लिहाज से यह महत्वपूर्ण घटना है साथ ही पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों पर भी इसका असर पड़ेगा। इमरान खान की हाल की चीन यात्रा के दौरान शी चिनफिंग ने इस बात की उम्मीद जाहिर की कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में सुधार होगा। दक्षिण एशिया की प्रगति और विकास के लिए यह जरूरी भी है। दक्षिण एशिया के देशों के बीच सम्पर्क तबतक ठीक नहीं होगा, जबतक भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बेहतर नहीं होंगे। फरवरी में पुलवामा कांड के बाद चीन ने अपने उप विदेश मंत्री शुआनयू को पाकिस्तान भेजा था, ताकि तनाव बढ़ने न पाए। चीन को लेकर भारत में एक खास तरह की चिंता हमेशा रहती है। पकिस्तान के प्रति उसका झुकाव बी जाहिर है। क्या वह अपने इस झुकाव को कम करेगा? क्या वह संतुलन स्थापित करेगा? लोकसभा चुनाव के बाद ऐसे सवाल फिर से विमर्श का विषय बनेंगे।

इस बीच चीन ने अरबों डॉलर की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना से बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे को हटा दिया है। बीसीआईएम को हटाए जाने के कारणों के बारे में तत्काल कुछ नहीं बताया गया है, लेकिन अप्रैल के अंतिम सप्ताह में आयोजित बेल्ट एंड रोड फोरम के दूसरे शिखर सम्मेलन में जारी सूची में जिन परियोजनाओं का जिक्र किया गया है, उनमें इस गलियारे का उल्लेख नहीं है। भारत ने बेल्ट एंड रोड के तहत बन रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करते हुए इस कार्यक्रम से अपनी दूरी बना रखी है और इसके दूसरे सम्मेलन में भी उसने भाग नहीं लिया। अनुमान लगाया जा सकता है कि इस विरोध की खीझ में चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे (बीसीआईएम) को लिस्ट से बाहर कर दिया है।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

लाहौर में इस साल भी नहीं मनेगा बसंत, पर चर्चा जरूर है


http://epaper.navjivanindia.com//imageview_257_173242334_4_71_03-02-2019_i_1_sf.html
जिस तरह भारत में सांस्कृतिक सवालों पर आए दिन धार्मिक कट्टरता के सवाल उठते हैं तकरीबन उसी तरह पाकिस्तान में भी उठते हैं। दक्षिण एशिया के समाज में तमाम उत्सव और समारोह ऐसे हैं, जो धार्मिक दायरे में नहीं बँधे हैं। वसंत पंचमी या श्रीपंचमी ऐसा ही मौका है, जो ऋतुओं से जुड़ा है। इसे भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है। पीला या बसंती रंग इसकी पहचान है और इसे मनाने के अलग-अलग तरीके हैं। पंजाब में बसंत के दिन पतंगे उड़ाने की परम्परा है। विभाजन के बाद भी यह परम्परा चली आ रही है, पर पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान बसंत के उत्सव पर रोक लगी हुई है। वहाँ की पंजाब सरकार ने पतंगबाजी से पैदा होने वाले खतरों को लेकर इसपर रोक लगा रखी है, पर काफी लोग मानते हैं कि इस त्योहार की हिन्दू पहचान को लेकर सवालिया निशान खड़े हुए थे, जो पाबंदी की असली वजह है।  

भारत में मुगल बादशाहों ने बसंत को सांस्कृतिक रूप से स्वीकार किया था और उसे बढ़ावा दिया था। मुग़ल काल की मिनिएचर पेंटिंग में बसंत-उत्सव की झलक मिलती है। महाराजा रंजीत सिंह ने अपने दौर में बसंत के दौरान दस दिन की छुट्टी घोषित कर रखी थी। उनके सैनिक इस दौरान पीले रंग के वस्त्र पहनते थे। बँटवारे के बाद पाकिस्तानी पंजाब में भी पतंग उड़ाने का रिवाज़ बना रहा। बल्कि हुआ यह कि अस्सी के दशक में भारत के मुकाबले पाकिस्तानी समाज में पतंगबाजी ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर गई। इसकी एक वजह शायद पाकिस्तानी समाज के अंतर्विरोध थे। वह ज़ियाउल हक़ का दशक भी था, जब साहित्य, कला और संस्कृति को धार्मिक-दृष्टि से देखना शुरू हुआ। मनोरंजन पर पाबंदियाँ लगीं, जिसमें फ़िल्म और रंगमंच भी शामिल थे। सैनिक सरकार और पाबंदियों के उस दौर में लोगों को मनोरंजन और तफरीह का एक रास्ता बसंत की शक्ल में नजर आया। इसके केन्द्र में थी, पतंगबाजी।

शनिवार, 12 जनवरी 2019

ताइवान का चीन में विलय क्या कभी सम्भव होगा?

http://epaper.navjivanindia.com//imageview_213_18223975_4_71_13-01-2019_i_1_sf.html
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को युद्ध के  लिए तैयार रहने को कहा है। शुक्रवार 4 जनवरी को सेंट्रल मिलिट्री कमीशन (सीएमसी) की पेइचिंग में हुई बैठक में उन्होंने कहा कि देश के सामने खतरे बढ़ रहे हैं। वे इस कमीशन के अध्यक्ष हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसे बदलाव हो रहे हैं जैसे पिछली एक सदी में भी नहीं हुए थे। रॉयटर्स के अनुसार चीन दक्षिण चीन सागर में पर नियंत्रण बढ़ाना चाहता है। इसके अलावा अमेरिका के साथ व्यापार के मुद्दों को लेकर और ताइवान के चीनी एकीकरण के मसलों को लेकर तनाव है।

सीरिया में रूसी भूमिका भी बढ़ी

अमेरिकी सेना की वापसी की खबरें आने के बाद अब सवाल है कि सीरिया में होगा क्या? सवाल यह भी है कि वहाँ अमेरिकी सेना क्या करने के लिए गई थी? दाएश से लड़ने या राष्ट्रपति बशर अल असद की सरकार का तख्ता पलटने, हिज़्बुल्ला को हराने या कुर्दों का दमन रोकने? डोनाल्ड ट्रम्प का कहना है कि हम तो इस्लामिक स्टेट से लड़ने गए थे। अब वह तकरीबन हार चुका है, इसलिए हम वापस जा रहे हैं। बाकी का काम तुर्की और सऊदी अरब देखेंगे। पर लगता है कि अभी यहाँ काफी काम होना बाकी है। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद इस इलाके में रूस की भूमिका भी बढ़ी है।
सन 2011 में जब अरब देशों में जनांदोलन खड़े हो रहे थे, सीरिया के शासक बशर अल-असद के खिलाफ भी बगावत शुरू हुई। बशर अल-असद ने 2000 में अपने पिता हाफेज़ अल-असद की जगह ली थी। अरब देशों में सत्ता के ख़िलाफ़ शुरू हुई बगावत से प्रेरित होकर मार्च 2011 में सीरिया के दक्षिणी शहर दाराआ में भी लोकतंत्र के समर्थन में आंदोलन शुरू हुआ था, जिसने गृहयुद्ध का रूप ले लिया। उन्हीं दिनों इराक में इस्लामिक स्टेट उभार शुरू हुआ, जिसने उत्तरी और पूर्वी सीरिया के काफी हिस्सों पर क़ब्ज़ा कर लिया। इस लड़ाई में ईरान, लेबनान, इराक़, अफ़गानिस्तान और यमन से हज़ारों की संख्या में शिया लड़ाके सीरिया की सेना की तरफ़ से लड़ने के लिए पहुंचे।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

‘ग्लोबल पुलिसमैन’ की भूमिका से क्यों भागा अमेरिका?


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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी मेलानिया इराक में तैनात अमेरिकी सैनिकों को बधाई देने के लिए बुधवार 26 दिसम्बर की रात अचानक इराक जा पहुंचे। राष्ट्रपति के रूप में यह ट्रम्प की पहली इराक यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान बग़दाद के पश्चिम में स्थित एअर बेस पर पत्रकारों से उन्होंने कहा कि अमेरिका ग्लोबल पुलिसमैन की भूमिका नहीं निभा सकता। हमने दुनिया की रखवाली का ठेका नहीं लिया है। दूसरे देश भी जिम्मेदारियों को बाँटें। उन्होंने सीरिया से अपने सैनिकों को वापस बुलाने और बाकी क्षेत्रीय देशों खासकर तुर्की पर आईएस का मुकाबला करने की जिम्मेदारी डालने के अपने फैसले के पक्ष में कहा कि यह ठीक नहीं है कि सारा बोझ हम पर डाल दिया जाए। यों भी अब सीरिया में अमेरिका की जरूरत नहीं है, क्योंकि आईएस को हरा दिया गया है।

मंगलवार, 1 जनवरी 2019

2018 की वैश्विक हलचल


पैक्स अमेरि epaper.navjivanindia.com//imageview_194_15853939_4_71_30-12-2018_i_1_sf.htmlकाना का उतार
यानी कि अमेरिकी पराभव का प्रारम्भ। इस साल की घटनाओं को मिलाकर पढ़ने से जाहिर होता है कि यह साल अमेरिका के वैश्विक रसूख में गिरावट का साल था। साल में अंत में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी की घोषणा करके इस बात की पुष्टि भी कर दी। उनके इस फैसले से असहमत रक्षामंत्री जेम्स मैटिस और एक अन्य उच्च अधिकारी ब्रेट मैकगर्क ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। मैकगर्क सीरिया में आईएस के खिलाफ बनाए गए वैश्विक गठबंधन में अमेरिका के विशेष दूत थे।
डेमोक्रेटों की वापसी
नवम्बर में हुए अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों को आंशिक सफलताएं मिलीं। जहाँ सीनेट में डोनाल्ड ट्रम्प की पार्टी रिपब्लिकन को और प्रतिनिधि सदन में डेमोक्रेटिक पार्टी को बहुमत प्राप्त हो गया है। इसका अर्थ है कि ट्रम्प प्रशासन को न्यायिक और प्रशासनिक नियुक्तियाँ करने में दिक्कत नहीं होगी, पर नीतियों और खर्च से जुड़े जिन मामलों में प्रतिनिधि सदन की सहमति की जरूरत होती है, वहाँ उन्हें दिक्कत का सामना करना होगा। इससे यह भी साबित हुआ है कि ट्रम्प की लोकप्रियता कम हो रही है।
वेनेजुएला में संकट
वेनेजुएला में अर्थव्यवस्था संकट में है। लाखों लोग देश छोड़कर जा रहे हैं, महंगाई हज़ारों गुना बढ़ गई है। वहां एक कॉफी के कप की क़ीमत 25 लाख रुपये हो चुकी है। इस साल मई में हुए चुनाव में वहाँ निकोलस माडुरो फिर से राष्ट्रपति बने हैं। इस देश में बड़ी संख्या में तेल के भंडार हैं, लेकिन यही ताक़त आर्थिक समस्याओं का कारण भी बन गई है। तेल से मिलने वाला राजस्व उसके निर्यात का 95 प्रतिशत है। सन 2014 में तेल की क़ीमतें गिरने के बाद से उसके विदेश मुद्रा भंडार में भारी कमी होने लगी है।
यमन में शांति-स्थापना
पश्चिम एशिया के देश यमन में साल के अंत में संरा के प्रयासों से शांति-स्थापना के लिए समझौता हो जरूर गया है, पर छिटपुट हिंसा अब भी जारी है। सन 2014 से यह देश हिंसा की चपेट में है, जिसके कारण लाखों लोग भुखमरी की चपेट में हैं। अनुमान है कि सऊदी अरब-नीत गठबंधन और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष में 14 हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और युद्ध के कारण पैदा हुए अकाल ने 50 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। यमन के अलावा मध्य अफ्रीका के कांगो और दक्षिण सूडान में भी युद्ध के कारण मानवीय त्रासदी पैदा हो गई है।
मीटू आंदोलन का वैश्विक-प्रसार
एक साल पहले हॉलीवुड के निर्माता हार्वे वांइंसटाइन पर कुछ महिलाओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए। न्यूयॉर्क टाइम्स और न्यूयॉर्कर ने इस आशय की खबरें प्रकाशित कीं। देखते ही देखते यह आंदोलन दुनियाभर के देशों में फैल गया है। ट्विटर पर हैशटैग मीटू के रूप में शुरू हुआ यह आंदोलन अब कार्यक्षेत्र पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ वैश्विक अभियान की शक्ल ले चुका है। यह वाक्यांश अब स्त्री-मुक्ति का आप्त-वाक्य बन चुका है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि इस साल नोबेल शांति पुरस्कार डेनिस मुकवेगे और नादिया मुराद को यौन हिंसा के खिलाफ कोशिशों के लिए दिया गया है।
सऊदी अरब में बदलाव
यह साल सऊदी अरब में आ रहे बदलावों के लिए भी याद रखा जाएगा। वहाँ स्त्रियों के प्रति बर्ताव में बदलाव आ रहा है। देश के युवा क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) के नेतृत्व में विजन-2030 तैयार किया गया है, ताकि अर्थव्यवस्था केवल पेट्रोलियम के सहारे न रहे। वहीं अक्तूबर के महीने में तुर्की के शहर इस्तानबूल में सऊदी अरब के वाणिज्य दूत कार्यालय में सऊदी मूल के पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या के विवाद में राजघराना बुरी तरह घिर गया है। इस हत्याकांड को दबाने का प्रयास करने के कारण अमेरिकी राष्ट्रपति भी आलोचना के दायरे में हैं।
ईरानी नाभिकीय-संधि टूटी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पिछले साल अपने चुना अभियान के दौरान ही घोषणा कर दी थी कि मैं ईरान के साथ नाभिकीय-संधि तोड़ दूँगा। इस साल मई में उन्होंने यह कारनामा करके दिखा दिया। ट्रम्प ने यह कदम अपने कई सलाहकारों और रक्षामंत्री जेम्स मैटिस की राय के खिलाफ उठाया। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मन नेताओं ने भी उन्हें रोका। ट्रम्प ने संधि ही नहीं तोड़ी, ईरान पर पाबंदियों की घोषणा भी कर दी। अमेरिका के विदेशमंत्री माइक पोम्पिओ का कहना है कि हमारा उद्देश्य केवल ईरान की नाभिकीय-शक्ति को समाप्त करना नहीं, वहाँ लोकतंत्र की स्थापना करना है। 
चीन-अमेरिका ट्रेड-वॉर
यह साल चीन और अमेरिका के बीच छिड़े कारोबारी-संग्राम के लिए भी याद किया जाएगा। इसमें निशाना चीन है, पर कमोबेश दूसरे देश भी इससे प्रभावित होंगे। साल जनवरी में ही अमेरिका ने वॉशिंग मशीनों और सोलर पैनल के आयात पर  टैक्स बढ़ाने की घोषणा की। इसके बाद मार्च में स्टील और अल्युमिनियम पर टैक्स बढ़ाया। जुलाई में उन्होंने युरोपियन संघ के साथ इस सिलसिले में एक समझौता भी किया। फिलहाल ब्यूनस आयर्स में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन के हाशिए पर ट्रम्प और चीनी राष्ट्रपति की मुलाकात के बाद 90 दिन का युद्ध-विराम चल रहा है।
ब्रेक्जिट पर लुका-छिपी
इस साल यूरोप में ब्रेक्जिट काफी बड़ी खबर बना रहा। सन 2015 में ब्रिटिश जनता ने एक जनमत संग्रह में युरोपियन संघ से अलग होने का फैसला किया था। उस फैसले को लागू करने की घड़ी जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, दिक्कतें बढ़ती जा रहीं हैं। यूरोपीय संघ के सदस्यों ने रविवार 25 नवम्बर को ब्रेक्जिट समझौते को मंजूरी दे दी। बेशक यह समझौता ईयू ने स्वीकार कर लिया है, पर ब्रिटिश संसद से इसकी पुष्टि अब सबसे बड़ा काम है। युनाइटेड किंगडम की संसद इस प्रस्ताव पर 12 दिसम्बर को फैसला करना था, पर अब यह जनवरी तक टल गया है।
जलवायु परिवर्तन
यह साल वैश्विक जलवायु परिवर्तन के खतरों का संदेश भी लेकर आया था। अक्तूबर में संयुक्त राष्ट्र के इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की रिपोर्ट में कहा गया है कि हमारे पास अभी करीब 12 साल का समय है कि हम दुनिया के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए कुछ कदम उठा सकते हैं। सन 2015 में दुनिया के देशों में इस सिलसिले में पेरिस संधि की थी, जिसे 2020 में लागू करना है। पोलैंड के कैटोविस में 2 से 15 दिसम्बर, 2018 तक वैश्विक जलवायु सम्मेलन हुआ, पेरिस संधि को लागू करने के लिए एक नियम-पुस्तिका बनाई गई है।

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी वापसी के मायने




अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अपने हजारों सैनिकों को वापस बुलाने की योजना बनाई है। अमेरिकी मीडिया ने अधिकारियों के हवाले से रिपोर्टों में बताया है कि महीने भर में 7,000 सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से वापस चले जाएंगे। वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार जल्द ही ह्वाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ का पद छोड़ने जा रहे जॉन केली और ह्वाइट हाउस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन सहित ट्रम्प के वरिष्ठ कैबिनेट अधिकारियों के विरोध के बावजूद इस पर विचार किया जा रहा है। इसके एक दिन पहले ट्रम्प ने सीरिया से सैनिकों को हटाने की घोषणा की थी। उनके इस फैसले से असहमत रक्षामंत्री जेम्स मैटिस और एक अन्य उच्च अधिकारी ब्रेट मैकगर्क ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इधर शनिवार 29 दिसम्बर को ह्वाइट हाउस ने कहा है कि राष्ट्रपति ने अफ़ग़ानिस्तान से वापसी के बाबत कोई फैसला नहीं किया है। 

भारतीय नज़रिए से महत्वपूर्ण हैं बांग्लादेश के चुनाव


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इस साल नेपाल, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और मालदीव में हुए चुनावों के बाद इस हफ्ते बांग्लादेश की संसद के चुनाव होने जा रहे हैं। मतदाता 30 दिसम्बर को 350 सदस्यों वाली 11वीं संसद के सदस्यों को चुनेंगे। इन सदस्यों में से 300 सीधे फर्स्ट पास्ट द पोस्ट की पद्धति से चुने जाएंगे। 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं, जिनका चुनाव पार्टियों को प्राप्त वोटों के अनुपात में किया जाएगा। बांग्लादेश हमारे उन पड़ोसी देशों में से एक है, जिनके साथ हमारे रिश्ते पिछले एक दशक से अच्छे चल रहे हैं। इसकी बड़ी वजह शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग की सरकार है।

अवामी लीग की सरकार ने भारत के पूर्वोत्तर में चल रही देश-विरोधी गतिविधियों पर रोक लगाने में काफी मदद की है। दूसरी तरफ भारत ने भी शेख हसीना के खिलाफ हो रही साजिशों को उजागर करने और उन्हें रोकने में मदद की है। शायद इन्हीं कारणों से जब 2014 के चुनाव हो रहे थे, तब भारत ने उन चुनावों में दिलचस्पी दिखाई थी और हमारी तत्कालीन विदेश सचिव सुजाता सिंह ढाका गईं थीं। उस चुनाव में खालिदा जिया के मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार किया था। इस वजह से दुनिया के कई देश उस चुनाव की आलोचना कर रहे थे।

शनिवार, 22 दिसंबर 2018

क़तर ने ओपेक का दामन छोड़ा


तेल कीमतों के साथ तेल-उत्पादन की राजनीति में भी बदलाव नजर आ रहा है। एक तरफ ओपेक के साथ रूस के रिश्ते बन रहे हैं, वहीं पश्चिम एशिया की राजनीति के अंतर्विरोध ओपेक में भी नजर आने लगे हैं। रूस की भूमिका बढ़ने के साथ-साथ ओपेक के छोटे सदस्य देशों को लगता है कि उनकी आवाज दबने लगी है। दिसम्बर को पहले हफ्ते में जब वियना में ओपेक की बैठक होने वाली थी, उसके पहले क़तर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने घोषणा की कि आगामी जनवरी में क़तर ओपेक को छोड़ देगा। उन्होंने कहा कि इसके पीछे कोई राजनीतिक कारण नहीं है। क़तर प्राकृतिक गैस की ओर अधिक ध्यान देना चाहता है। क़तर की अर्थव्यवस्था में तेल से ज्यादा गैस का महत्व है। इतनी ही नहीं रविवार 9 दिसम्बर को सऊदी अरब में हुई खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) की शिखर-बैठक में भी क़तर शामिल नहीं हुआ।

पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि इस अलहदगी के कारण स्पष्ट हैं। सऊदी अरब के साथ क़तर के रिश्तों में आया बिगाड़ इसके पीछे बड़ा कारण है। एक साल से ज्यादा लम्बे अरसे से सऊदी अरब ने क़तर की आर्थिक और डिप्लोमैटिक-नाकेबंदी कर रखी है। क़तर को लगता है कि ओपेक में सऊदी अरब और दूसरे खाड़ी देशों की भूमिका बहुत ज्यादा है। ओपेक ने क़तर के अलग होने के फ़ैसले पर अपने आधिकारिक बयान में कहा कि यह संगठन को राजनीतिक तौर पर कमज़ोर करने की कोशिश है। क़तर और सऊदी अरब दोनों के रिश्ते अमेरिका के साथ अच्छे हैं। यह भी सच है कि सऊदी नाकेबंदी के बावजूद इन्हीं रिश्तों के कारण क़तर ने खुद को बचा रखा है। खाशोज्जी-हत्याकांड और अब तेल-उत्पादन में गिरावट के कारण अमेरिकी प्रशासन का एक तबका सऊदी सरकार से नाराज है। हालांकि डोनाल्ड ट्रम्प के व्यक्तिगत रूप से सऊदी शाही परिवार से रिश्ते अच्छे हैं, पर कहना मुश्किल है कि घटनाक्रम किस तरफ जाएगा। 

मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

चीन-अमेरिका कारोबारी-जंग में फौरी विराम



ब्यूनस आयर्स में हुआ जी-20 शिखर सम्मेलन भविष्य के लिए कुछ महत्वपूर्ण छोड़कर गया है। सम्मेलन के हाशिए पर हुई वार्ताओं के कारण अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध में फिलहाल कुछ समय के लिए विराम लगा है। दूसरी तरह अमेरिका वैश्वीकरण के रास्ते को छोड़कर अपने राष्ट्रीय हितों की ओर उन्मुख हुआ है। उसकी दिलचस्पी पर्यावरण संरक्षण, शरणार्थियों तथा रोजगार की तलाश में प्रवास पर निकलने वालों को अपने यहाँ जगह देने में नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का इस्तेमाल वह अपने लिए करने पर जोर दे रहा है।

सोमवार, 3 दिसंबर 2018

खाड़ी-देशों से सुधर रहे हैं इस्रायल के रिश्ते


इस्रायल के चैनल-2 ने खबर दी है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने बहरीन के साथ राजनयिक रिश्ते स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की है। उन्होंने यह बात कनाडा के राष्ट्रपति इदरीस डैबी की यरूशलम यात्रा के दौरान कही। एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा, हमने पाया है कि कुछ अरब देशों का इस्रायल के बारे में विचार बदल रहा है। नेतन्याहू अचानक 25 अक्तूबर को ओमान के दौरे पर गए और वहाँ उन्होंने राजधानी मस्कट के पास के शहर सीब के शाही महल में सुल्तान सैयद कबूस से मुलाकात की। पिछले 22 साल में किसी इस्रायली शासनाध्यक्ष का अरब देश में यह पहला दौरा था।

इस्रायल के केवल दो अरब देशों के साथ राजनयिक सम्बंध हैं। ये हैं मिस्र और जॉर्डन। अब नेतन्याहू ने इशारा किया है कि उनके रिश्ते खाड़ी के देशों के साथ सुधर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मैं कुछ और अरब देशों में जाऊँगा। जल्द ही बहरीन जाने वाला हूँ। इतना ही नहीं बहरीन ने इस्रायल के वित्तमंत्री एली कोहेन को अप्रैल में होने वाले एक सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। तीन दिन का यह सम्मेलन विश्व बैंक ने आयोजित किया है। बहरीन के साथ इस्रायल के राजनयिक सम्बंध स्थापित करने पर बात भी चल रही है।

अक्तूबर में नेतन्याहू के ओमान दौरे के कुछ दिन बाद नवम्बर में इस्रायली परिवहन और इंटेलिजेंस मंत्री यिसरायल काट्ज ने ओमान में एक परिवहन सम्मेलन में शिरकत की। पिछले कुछ दिनों में इस्रायल की तरफ से और कुछ अरब देशों की तरफ से लगातार ऐसे संकेत मिल रहे हैं, जिनसे लगता है कि इनके रिश्ते सुधरने जा रहे हैं। ओमान के साथ इस्रायल के राजनयिक रिश्ते नहीं हैं, पर नेतन्याहू का वहाँ जाना बता रहा है कि इस यात्रा के पीछे पहले से अंदरूनी तौर पर विचार-विमर्श किया गया है। ओमान इस इलाके में प्रभावशाली देश है। लगता है कि पृष्ठभूमि में कुछ चल रहा है।

रविवार, 2 दिसंबर 2018

पेट्रोलियम की गिरती कीमतें और वैश्विक-संवाद


यूरोप में ब्रेक्जिट-विमर्श अपने अंतिम दौर में है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध अब दूसरे दौर में प्रवेश करना चाहता है। भारत जैसे विकासशील देश इंतजार में कि उन्हें किस तरह से इसका लाभ मिले। इधर पेट्रोलियम की कीमतों में गिरावट का रुख अब भी जारी है। हर हफ्ते पाँच से सात फीसदी कीमतें कम हो रहीं है। पिछले साल अक्तूबर से अबतक कीमतें करीब एक तिहाई गिर चुकी हैं। पिछले हफ्ते अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास मध्यावधि वादा बाजार में रेट 50.42 डॉलर हो गए थे। तेल उत्पादक देशों का संगठन ओपेक उत्पादन घटा रहा है और अमेरिका बढ़ा रहा है। ओपेक की कोशिश है कि कीमतें इतनी न गिर जाएं कि संभालना मुश्किल हो जाए।

सऊदी अरब पर अमेरिकी दबाव है कि कीमतों को बढ़ने न दिया जाए। दूसरी तरफ वह रूस के साथ मिलकर कीमतों को गिरने से रोकना चाहता है। अंदेशा इस बात का है कि पेट्रोलियम की माँग घटेगी। यानी कि वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर से मंदी तरफ बढ़ेगी। सऊदी अरब एक तरफ खाशोज्जी हत्याकांड के कारण विवादों से घिरा है, वहीं तेल की कीमतों और अपनी अर्थव्यवस्था की पुनर्रचना के प्रयासों में उसे एक के बाद एक झटके लग रहे हैं।

शनिवार, 24 नवंबर 2018

खाशोज्जी-हत्या में क्राउन प्रिंस पर संदेह का घेरा


पश्चिम एशिया में इसरायल के बाद सऊदी अरब ऐसा देश है, जिसे अमेरिका का सबसे करीबी माना जाता है। पर इधर पत्रकार जमाल खाशोज्जी की हत्या की जुड़ती कड़ियों के कारण कई तरह के असमंजस उसके सामने खड़े हो रहे हैं। पिछले हफ्ते सीआईए की एक रिपोर्ट में कहा गया कि इस हत्या की जानकारी सऊदी क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान को थी। ट्रम्प प्रशासन ने इस रिपोर्ट की अनदेखी कर दी है, पर मामला दब नहीं रहा है। सीनेट की विदेश सम्बंध समिति के अध्यक्ष बॉब कॉर्कर ने अपने ट्वीट में कहा है, इस हत्या के आरोप में क्राउन प्रिंस किसी को मौत की सज़ा दें, उसके पहले ट्रम्प प्रशासन को अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए।

इतना ही नहीं सीनेटर एड मार्की ने ट्रम्प प्रशासन से माँग की है कि सऊदी अरब के साथ सिविल न्यूक्लियर सहयोग की वार्ता बंद करें और उसे नाभिकीय रिएक्टर बेचने की योजना पर रोक लगाएं। व्यक्तिगत रूप से ट्रम्प के सऊदी राजघराने से अच्छे रिश्ते हैं। अमेरिका ने सऊदी नीतियों की आलोचना नहीं की है, पर अमेरिका की संसद यमन में सऊदी सैनिक हस्तक्षेप और अब खाशोज्जी की हत्या के सवाल पर परोक्ष रूप से अपनी चिंता व्यक्त कर रही है।

टेरेसा मे के सामने ब्रेक्जिट की चुनौती


फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पिछले हफ्ते पहले विश्व युद्ध की 100वीं वर्षगाँठ पर हुए एक समारोह में कहा, राष्ट्रवाद दुनिया के लिए खतरा है। राष्ट्रवाद और देशभक्ति एक-दूसरे के विरोधी हैं। उन्होंने कहा, यह कहना कि मेरे हित सबसे आगे हैं दूसरे भाड़ में जाएं, इंसानियत की मूल अवधारणा के खिलाफ है। यूरोप और पश्चिम एशिया से पहले विश्व युद्ध के बादल पूरी तरह कभी छँटे नहीं हैं। हमें मिलकर काम करना चाहिए। जलवायु परिवर्तन, गरीबी और असमानता के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ें। मैक्रों सेंटरिस्ट और वृहत यूरोपवादी नेता हैं और वे जिस समारोह में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे, उसमें 60 देशों के राष्ट्राध्यक्ष मौजूद थे। इनमें डोनाल्ड ट्रम्प और व्लादिमीर पुतिन भी थे।

  राष्ट्रवाद, देशभक्ति और वैश्वीकरण के वात्याचक्र में दुनिया फिर घिरती जा रही है। मैक्रों के विचारों पर एक अलग बहस चल निकली है, पर पिछले हफ्ते ब्रिटेन से व्यवहारिक राजनीति से जुड़ी कुछ खबरें बाहर निकली हैं, जो इस बहस का हिस्सा बनेंगी या बन रहीं हैं। यह बहस है यूरोप के एकीकरण बनाम ब्रेक्जिट की। यूरोप का एकीकरण ब्रिटिश राजनीति में बहस का विषय है, खासतौर से सत्तारूढ़ गठबंधन की सबसे बड़ी कंजर्वेटिव पार्टी के भीतर इस विषय को लेकर गहरे अंतर्विरोध है। दो साल पहले ब्रिटेन की जनता ने जनमत संग्रह में यूरोपीय यूनियन से अलग होने के पक्ष में फैसला किया था। इसे ब्रेक्जिट कहते हैं। अब जैसे-जैसे ब्रेक्जिट के दिन करीब आ रहे हैं, जटिलताएं बढ़ रही हैं। यूरोपीय यूनियन से अलग होने की शर्तों को लेकर विवाद है। 

रविवार, 18 नवंबर 2018

संरा के द्वार पर चीन के वीगरों का मामला


चीन के शिनजियांग प्रांत में रहने वाले वीगर मुसलमानों के (अंग्रेजी वर्तनी के कारण हिन्दी में काफी लोग इन्हें उइगुर भी लिख रहे हैं) दमन की खबरें आने के बाद संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने सख्त रुख अख्तियार किया है। पिछली 6 नवम्बर को जिनीवा में परिषद की एक समीक्षा बैठक में यह मामला उठाया गया। इस समीक्षा बैठक में अमेरिका, जापान और कनाडा समेत कुछ देशों के प्रतिनिधियों ने चीनी नीतियों की कड़ी आलोचना की। इसमें कहा गया कि चीन ने अपने विशेष कैम्पों में वीगर नागरिकों को कैद कर रखा है, उन्हें फौरन रिहा किया जाए।

हालांकि चीन ने इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया, पर मीडिया में जो खबरें मिल रहीं हैं उनसे लगता है कि इन आरोपों का जवाब देना उसके मुश्किल होता जाएगा। मानवाधिकार परिषद के भीतर यह धारणा पुष्ट होती जा रही है कि चीन का व्यवहार चिंताजनक है। मंगलवार 6 नवम्बर की बैठक के लिए चीन अपनी तरफ से तैयारी करके आया था। इसके लिए उसने अपने उप विदेशमंत्री को खासतौर से भेजा था। उनके साथ शिनजियांग प्रांत की राजधानी उरुमची के मेयर यासिम सादिक भी आए थे, जो वीगर मूल के हैं। सादिक ने कहा कि वीगर प्रशिक्षु इन कैम्पों में अपनी इच्छा से आए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चीन  सरकार के प्रयासों के कारण पिछले 21 महीनों में इस इलाके में एक भी आतंकी हमला नहीं हुआ है। विश्व समुदाय मानता है कि आबादी के चुनींदा चीन-परस्त लोगों की बात पूरे समुदाय की राय नहीं हो सकती।

श्रीलंका में उलझती दाँव-पेच की राजनीति


श्रीलंका में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद वहाँ की संसद ने महिंदा राजपक्षे के प्रति अपना अविश्वास जरूर व्यक्त कर दिया है, पर गतिरोध समाप्त हुआ नहीं लगता। सवाल है कि क्या राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना इस वोट को मान लेंगे? लगता नहीं। यानी कि केवल इतने से रानिल विक्रमासिंघे को सत्ता वापस मिलने वाली नहीं है। इसकी दो वजहें हैं। एक, देश की सांविधानिक व्यवस्थाएं अस्पष्ट हैं। सन 2015 के सांविधानिक सुधारों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि संसद और राष्ट्रपति के रिश्ते किस प्रकार तय होंगे। दूसरे, सुप्रीम कोर्ट ने संसद भंग करने के राष्ट्रपति के आदेश को स्थगित जरूर कर दिया, पर यह स्पष्ट नहीं किया कि आगे क्या होगा।

संसद अध्यक्ष ने सत्र बुलाया और राजपक्षे के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया। पर इससे प्रधानमंत्री की पुनर्स्थापना नहीं हो पाई। यानी कि अदालत को फिर से हस्तक्षेप करना होगा। पर यह भी साफ है कि महिंदा राजपक्षे के पास भी बहुमत नहीं है। संसद को भंग किया ही इसीलिए गया था। बुधवार को चली छोटी सी कार्यवाही में राजपक्षे ने उपस्थित होकर इस सत्र की वैधानिकता को स्वीकार किया, पर उसका बहिष्कार करके यह संकेत भी दिया कि वे आसानी से हार नहीं मानेंगे। राष्ट्रपति सिरीसेना और राजपक्षे दोनों को समझ में आता है कि संसद में वे अल्पमत में हैं, वरना वे संसद-सत्र के पाँच दिन पहले ही उसे भंग नहीं करते।

अमेरिकी वोटर की ट्रम्प को चेतावनी


अमेरिकी संसद के मध्यावधि चुनाव परिणाम अंदेशों या अनुमानों के अनुरूप ही आए हैं। ब्रिटिश पत्रिका इकोनॉमिस्ट ने इन परिणामों के आधार पर अमेरिकी प्रशासन को विभाजित देश की विभाजित सरकार बताया है। यों दोनों पक्षों ने इन परिणामों को अपनी विजय बताया है। आंशिक रूप से दोनों को कुछ न कुछ मिला है। पर 2016 के परिणामों से तुलना करें, तो कहा जा सकता है कि ट्रम्प सरकार के खिलाफ यह वोटर की नाराज टिप्पणी है। प्रतिनिधि सदन में वोटर की आवाज अब साफ सुनाई पड़ेगी। ये परिणाम घटिया गवर्नेंस और वोटर की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति वितृष्णा की तरफ इशारा कर रहे हैं। ऐसे ही परिणामों की भविष्यवाणी थी, जो सही साबित हुई।

अमेरिकी संसद के दो सदन हैं। हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव्स में 435 सदस्य होते हैं। और दूसरा है, सीनेट। इसमें 100 सदस्य होते हैं। सीनेट की चक्रीय व्यवस्था के तहत इस बार 35 (33+2) सीटों पर चुनाव हुए। अभी तक दोनों सदनों में रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत था, पर अब प्रतिनिधि सदन में डेमोक्रेट्स का बहुमत हो गया है। पिछले आठ साल से रिपब्लिकन पार्टी का इस सदन पर कब्जा था। अमेरिकी व्यवस्था में मतगणना अपेक्षाकृत सुस्त होती है। अंतिम रूप से परिणाम इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उपलब्ध नहीं थे, पर प्रतिनिधि सदन में डेमोक्रेटिक पार्टी की सदस्य संख्या 240 के करीब पहुँच गई है। वहीं रिपब्लिकन पार्टी का सीनेट में बहुमत पहले से ज्यादा हो गया है। उनके पास अब 100 में से 54 सीटें होने की सम्भावना है।
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