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शनिवार, 27 अप्रैल 2019

श्रीलंका में दाएश का हमला समूचे भारतीय-भूखंड के लिए सबक और चेतावनी


सीरिया में पिटाई के बाद लगता था कि इस्लामिक स्टेट कहीं न कहीं सिर उठाएगा। उसे अपनी उपस्थिति का एहसास कराना है। श्रीलंका में रविवार को हुई हिंसा की जिम्मेदारी लेकर उसने इस बात को साबित किया है। अभी तक दक्षिण एशिया उसके निशाने से बचा हुआ था। यों 2016 में बांग्लादेश की घटनाओं के बाद कहा गया था कि वहाँ इस्लामिक स्टेट जड़ें जमा रहा है। कश्मीर घाटी में अक्सर उसके काले झंडे नजर आते हैं। फिर भी इस्लामिक स्टेट के खतरे को बहुत गम्भीरता से नहीं देखा गया। श्रीलंका की हिंसा भारत के लिए ही नहीं दक्षिण एशिया के सभी देशों के लिए चेतावनी है।
श्रीलंका में तकरीबन दस साल से चली आ रही शांति जिस भयानक हत्याकांड से भंग हुई है, वह समूचे भारत-भूखंड के लिए खतरे की घंटी है। दुनिया की सबसे बहुरंगी-बहुल संस्कृति वाला समाज इसी इलाके में रहता है। करीब तीन दशक तक चले तमिल-गृहयुद्ध के बाद उम्मीद थी कि श्रीलंका के निवासी जातीय-साम्प्रदायिक आधारों पर अपने आपको बाँटने के बजाय सामूहिक सुख-समृद्धि के रास्ते तैयार करेंगे। इन कोशिशों को तोड़ने के प्रयास अब फिर शुरू हो गए हैं। बहरहाल श्रीलंका की प्रशासनिक-व्यवस्था ने इस हिंसा के बाद सम्भावित टकराव को रोकने में सफलता हासिल की है।

रविवार, 18 नवंबर 2018

श्रीलंका में उलझती दाँव-पेच की राजनीति


श्रीलंका में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद वहाँ की संसद ने महिंदा राजपक्षे के प्रति अपना अविश्वास जरूर व्यक्त कर दिया है, पर गतिरोध समाप्त हुआ नहीं लगता। सवाल है कि क्या राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना इस वोट को मान लेंगे? लगता नहीं। यानी कि केवल इतने से रानिल विक्रमासिंघे को सत्ता वापस मिलने वाली नहीं है। इसकी दो वजहें हैं। एक, देश की सांविधानिक व्यवस्थाएं अस्पष्ट हैं। सन 2015 के सांविधानिक सुधारों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि संसद और राष्ट्रपति के रिश्ते किस प्रकार तय होंगे। दूसरे, सुप्रीम कोर्ट ने संसद भंग करने के राष्ट्रपति के आदेश को स्थगित जरूर कर दिया, पर यह स्पष्ट नहीं किया कि आगे क्या होगा।

संसद अध्यक्ष ने सत्र बुलाया और राजपक्षे के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया। पर इससे प्रधानमंत्री की पुनर्स्थापना नहीं हो पाई। यानी कि अदालत को फिर से हस्तक्षेप करना होगा। पर यह भी साफ है कि महिंदा राजपक्षे के पास भी बहुमत नहीं है। संसद को भंग किया ही इसीलिए गया था। बुधवार को चली छोटी सी कार्यवाही में राजपक्षे ने उपस्थित होकर इस सत्र की वैधानिकता को स्वीकार किया, पर उसका बहिष्कार करके यह संकेत भी दिया कि वे आसानी से हार नहीं मानेंगे। राष्ट्रपति सिरीसेना और राजपक्षे दोनों को समझ में आता है कि संसद में वे अल्पमत में हैं, वरना वे संसद-सत्र के पाँच दिन पहले ही उसे भंग नहीं करते।

शनिवार, 3 नवंबर 2018

श्रीलंका में तख्ता-पलट और भारतीय दुविधा


श्रीलंका में शुक्रवार 26 अक्तूबर को अचानक हुए राजनीतिक घटनाक्रम से भारत में विस्मय जरूर है, पर ऐसा होने का अंदेशा पहले से था। पिछले कुछ महीनों से संकेत मिल रहे थे कि वहाँ के शिखर नेतृत्व में विचार-साम्य नहीं है। सम्भवतः दोनों नेताओं ने भारतीय नेतृत्व से इस विषय पर चर्चा भी की होगी। बहरहाल अचानक वहाँ के राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री को बर्खास्त करके चौंकाया जरूर है। अमेरिका और युरोपियन यूनियन ने प्रधानमंत्री को इस तरीके से बर्खास्त किए जाने पर फौरन चिंता तत्काल व्यक्त की और कहा कि जो भी हो, संविधान के दायरे में होना चाहिए। वहीं भारत ने प्रतिक्रिया व्यक्त करने में कुछ देर की। शुक्रवार की घटना पर रविवार को भारतीय प्रतिक्रिया सामने आई।

रानिल विक्रमासिंघे को प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने पर भारत ने आशा व्यक्त की है कि श्रीलंका में संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों का आदर होगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा, 'श्रीलंका में हाल ही में बदल रहे राजनीतिक हलचल पर भारत पूरे ध्यान से नजर रख रहा है। एक लोकतंत्र और पड़ोसी मित्र देश होने के नाते हम आशा करते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक प्रक्रिया का सम्मान होगा।' भारत को ऐसे मामलों में काफी सोचना पड़ता है। खासतौर से हिंद महासागर के पड़ोसी देशों के संदर्भ में। पहले से ही आरोप हैं कि उसके अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते अच्छे नहीं हैं।
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