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शनिवार, 4 मई 2019

शांति के द्वार पर अफ़ग़ानिस्तान और लोया जिरगा


अफ़ग़ानिस्तान में शांति-स्थापना की दिशा में गतिविधियाँ जैसे-जैसे तेजी पकड़ रहीं हैं वैसे-वैसे इस प्रक्रिया के अंतर्विरोध भी सामने आ रहे हैं। दिसम्बर में अमेरिकी मीडिया ने खबर दी थी कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने पैंटागन से कहा है कि वे अप्रैल तक अफगानिस्तान में सैनिकों की संख्या 14,000 से घटाकर 7,000 कर दें। बाद में हालांकि अमेरिका सरकार ने इस बात का खंडन भी किया, पर बात कहीं न कहीं सच थी। अप्रैल गुजर चुका है, सेना की वापसी नहीं हुई है, पर घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदल रहा है।
सबसे बड़ी घटना है सोमवार से शुरू हुआ लोया जिरगा, यानी अफ़ग़ान नेतृत्व का महाधिवेशन। इसके समांतर अमेरिका-पाकिस्तान-तालिबान की बातचीत चल रही है और साथ ही अमेरिका-चीन-रूस संवाद भी। कुछ समय पहले अमेरिकी दूत ज़लमय ख़लीलज़ाद ने कहा था, हमें उम्मीद है कि इस साल जुलाई में अफगान राष्ट्रपति के चुनाव के पहले ही हम समझौता कर लेंगे। इसके पहले उन्होंने उम्मीद जताई थी कि समझौता अप्रैल तक हो जाएगा। फिलहाल लगता नहीं कि जुलाई तक समझौता हो पाएगा, पर कुछ न कुछ हो जरूर रहा है।

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

पूरे दक्षिण एशिया के लिए उम्मीदें जगाती है अफगान शांति-वार्ता

हाल में अफगानिस्तान में शांति-स्थापना के प्रयासों और अमेरिकी सेना की वापसी से जुड़ी खबरों के बीच 9 फरवरी के ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने एक विस्तृत समाचार प्रकाशित किया है कि अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान में तालिबान ठिकानों पर जबर्दस्त हमला बोला है। माना जा रहा है कि सन 2014 के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है। इन हमलों का उद्देश्य है तालिबान के साथ चल रही शांति-वार्ता में पकड़ अमेरिका के हाथ में रखना। तालिबान को यह भ्रम न रहे कि वे जीत रहे हैं, इसलिए अमेरिका मैदान छोड़कर भाग रहा है। हाल में राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने सालाना ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ भाषण में कहा था कि हम अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने पर विचार कर रहे हैं।

अमेरिका के ताजा हमलों की मार तालिबानी वार्ताकारों के स्वरों में भी सुनाई पड़ रही है। इस वार्ता का संचालन कर रहे अमेरिकी दूत ज़लमय खलीलज़ाद ने हाल में कहा है कि तालिबानियों ने अतीत के अनुभवों से काफी सीख ली है। वे अब अछूत देश बनकर नहीं रहना चाहते। वे यह भी जानते हैं कि इस लड़ाई का सैनिक समाधान सम्भव नहीं है। अफगानिस्तान-अभियान के वर्तमान अमेरिकी सैनिक कमांडर जनरल ऑस्टिन एस मिलर का उद्देश्य तालिबानी ग्रुपों को ज्यादा से ज्यादा तकलीफ पहुँचाना है, ताकि सीधे अमेरिका से बात करने के लिए उनपर दबाव बने।

अफगान सेना की क्षति

पिछले महीने राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कहा था कि उन्होंने सन 2014 में जब से कार्यभार सँभाला है, हमारी सेना के 45,000 सैनिक इस लड़ाई में मारे जा चुके हैं। यह संख्या काफी बड़ी है और अब तक बताई जा रही संख्याओं से कहीं ज्यादा है। अफगानिस्तान में सामान्यतः वसंत के बाद लड़ाई तेज हो जाती है और गर्मियों में जबर्दस्त तरीके से होती है। पिछले साल अगस्त में तालिबान ने गज़नी सूबे पर काफी समय तक अपना कब्जा बनाए रखा था। पर इस बार सर्दियों में ही हमले बोलने के पीछे अमेरिकी रणनीति है कि तालिबान सेना को गर्मियों भर इस नुकसान को पूरा करने में ही लगाए रखा जाए।

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