मंगलवार, 7 मई 2024

चीनी इशारों पर किस हद तक चलेगा मालदीव?


 देस-परदेस

इस हफ्ते 10 मई तक मालदीव से भारतीय सैनिकों की वापसी पूरी हो जाएगी. पिछले दो महीनों में मालदीव से भारतीय सैन्यकर्मियों के दो बैच वापस आ चुके हैं और उनकी जगह असैनिक विशेषज्ञों को तैनात कर दिया है. शेष कर्मियों की तैनाती इस हफ्ते हो जाएगी.

बावजूद इसके लगता नहीं है कि दोनों देशों के रिश्तों में सुधार हो जाएगा, बल्कि गिरावट ही आ रही है. इसके पीछे चीन की भूमिका है, जिसने मालदीव के कुछ प्रभावशाली राजनीतिक नेताओं को लालच में फँसा लिया है और फिलहाल वहाँ की राजनीति ने उसे स्वीकार कर लिया है।

बात केवल चीन तक सीमित नहीं है. मालदीव भारत-विरोधी रास्तों को खोजता दिखाई पड़ रहा है. हाल में उसने तुर्की से कुछ ड्रोन और दूसरे शस्त्रास्त्र की खरीद की है. कश्मीर और पाकिस्तान से जुड़ी नीतियों के कारण तुर्की का भारत-विरोधी नज़रिया साफ है.

भारत-विरोधी प्रतीकों का मालदीव बार-बार इस्तेमाल कर रहा है. हाल में तुर्की कोस्टगार्ड के एक पोत का मालदीव में पोर्ट-विज़िट ऐसी ही एक प्रतीकात्मक-परिघटना है. 

विदेशमंत्री की यात्रा

एक खबर यह भी है कि मालदीव के विदेशमंत्री मूसा ज़मीर इस हफ्ते, 9 मई को भारत का दौरा करने वाले हैं. 9 मई को उनकी विदेशमंत्री एस जयशंकर से मुलाकात होगीतारीख का महत्व केवल इतना है कि 10 मई से मालदीव में सहायता कार्य कर रहे भारतीय विमानों का संचालन सैनिकों की जगह भारत की ही एक असैनिक तकनीकी-टीम करने लगेगी.

बुधवार, 28 फ़रवरी 2024

भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और जी-20


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दिल्ली में हो रहे शिखर सम्मेलन में रूस और चीन की भूमिकाओं को लेकर कई तरह के संदेह हैं, पर कुछ नई बातें भी हो रही हैं. भारत ने पहल करके अफ्रीकन यूनियन को जी-20 की पूर्ण-सदस्यता की पेशकश की है. इस प्रकार दुनिया की एक बड़ी आबादी को जी-20 के साथ जुड़कर अपने विकास का मौका मिलेगा. जी-20 की सदस्यता देश या संगठन की वैधानिकता और प्रभाव को व्यक्त करती है और उसे बढ़ाती भी है.

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के दौरान दुनिया की सुरक्षा केवल सैनिक-संघर्षों को टालने तक की मनोकामना तक सीमित थी. पिछले सात दशकों में असुरक्षा का दायरा क्रमशः बड़ा होता गया है. आर्थिक-असुरक्षा या संकट इनमें सबसे बड़े हैं. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण ऐसा क्षेत्र है, जिसका विस्तार वैश्विक है. हाल के वर्षों में इंटरनेट से जुड़े हमलों और अपराधों के कारण सायबर-सुरक्षा एक और नया विषय सामने आया है.

जी-20 का गठन मूलतः आर्थिक-संकटों का सामना करते हुए हुआ है. पर उसका दायरा बढ़ रहा है. दुनिया के 19 देशों और यूरोपियन यूनियन का यह ग्रुप-20 दुनिया की 85 फीसदी अर्थव्यवस्था और करीब दो तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, पर  अभी तक इसमें अफ्रीका महाद्वीप से केवल दक्षिण अफ्रीका ही इस ग्रुप का सदस्य है.

ग्लोबल साउथ की आवाज़

55 देशों के संगठन अफ्रीकन यूनियन के इसमें शामिल हो जाने से एक बड़ी रिक्ति की पूर्ति होगी. इस ब्लॉक की समेकित जीडीपी करीब तीन ट्रिलियन डॉलर की है. सैनिक तख्ता पलट के कारण इस समय इस संगठन ने अपने पाँच सदस्य देशों को निलंबित कर रखा है.

भारतीय अध्यक्षता में अफ्रीकन यूनियन को जी-20 की सदस्यता मिलने पर उस दावे को वैश्विक मंजूरी भी मिलेगी कि भारत ग्लोबल साउथ के देशों की आवाज बन चुका है. इसके साथ अफ्रीका के देशों में भारत के प्रति भरोसा बढ़ेगा.

‘हार्ड’ और ‘सॉफ्ट’ ताकतों से लैस ‘नया भारत’


भारत-
उदय-01

जी-20 में भारतीय अध्यक्षता का समापन एक नए शीतयुद्ध के प्रस्थान-बिंदु के रूप में हो रहा है. दुनिया फिर से दो ध्रुवों में बँट रही है और उसपर यूक्रेन-युद्ध की छाया है. दिल्ली में हो रहा शिखर सम्मेलन भारत के बढ़ते महत्व को रेखांकित कर रहा है. अलबत्ता उसके धैर्य, विवेक और संतुलन की परीक्षा भी यहाँ होगी.

भारत की भूमिका दो पक्षों के बीच में रहते हुए शांति की राह पर ले जाने वाले मार्ग-दर्शक की है, पर यह पचास के दशक क गुट-निरपेक्ष भारत नहीं है. तब हमारी राज्य-शक्ति सीमित थी. हम केवल नैतिक-शक्ति के सहारे थे. आज हम शक्ति के हार्ड और सॉफ्ट दोनों तत्वों से लैस हैं. दुनिया की महत्वपूर्ण आर्थिक शक्तियों में भारत की गिनती अब हो रही है. और भविष्य की दिशा बता रही है कि भारत अब दुनिया का नेतृत्व करेगा.

महाशक्ति की दिशा

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और टिप्पणीकार मार्टिन वुल्फ ने हाल में ब्रिटिश अखबार फाइनेंशियल टाइम्स में प्रकाशित अपने एक कॉलम में लिखा है कि भारत महाशक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहा है और 2050 तक भारत की अर्थव्यवस्था अमेरिका के बराबर पहुँच जाएगी. वे मानते हैं कि बेहतर नीतियों के साथ, यह वृद्धि और भी अधिक हो सकती है.

मंगलवार, 3 सितंबर 2019

अमेज़न की आग: इंसानी नासमझी की दास्तान


अमेज़न के जंगलों में लगी आग ने संपूर्ण मानवजाति के नाम खतरे का संदेश भेजा है। यह आग केवल ब्राजील और उसके आसपास के देशों के लिए ही खतरे का संदेश लेकर नहीं आई है। संपूर्ण विश्व के लिए यह भारी चिंता की बात है।  ये जंगल दुनिया के पर्यावरण की रक्षा का काम करते हैं। इन जंगलों में लाखों किस्म की जैव और वनस्पति प्रजातियाँ हैं। अरबों-खरबों पेड़ यहां खड़े हैं। ये पेड़ दुनिया की कार्बन डाई ऑक्साइड को जज्ब करके ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे को कम करते हैं। दुनिया की 20 फीसदी ऑक्सीजन इन जंगलों से तैयार होती है। इसे पृथ्वी के फेफड़े की संज्ञा दी जाती है। समूचे दक्षिण अमेरिका की 50 फीसदी वर्ष इन जंगलों के सहारे है। अफसोस इस बात का है कि यह आग इंसान ने खुद लगाई है। उससे ज्यादा अफसोस इस बात का है कि हमारे मीडिया का ध्यान अब भी इस तरफ नहीं गया है। 
जंगलों की इस आग की तरफ दुनिया का ध्यान तब गया, जब ब्राजील के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (आईएनईपी) ने जानकारी दी कि देश में जनवरी से अगस्त के बीच जंगलों में 75,336 आग की घटनाएं हुई हैं। अब ये घटनाएं 80,000 से ज्यादा हो चुकी हैं। आईएनईपी ने सन 2013 से ही उपग्रहों की मदद से जंगलों की आग का अध्ययन करना शुरू किया है। कई तरह के अनुमान हैं। पिछले एक दशक में ऐसी आग नहीं लगी से लेकर ऐसी आग कभी नहीं लगी तक।
यह आग इतनी जबर्दस्त है कि ब्राजील के शहरों में इन दिनों सूर्यास्त समय से कई घंटे पहले होने लगा है। देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। आग बुझाने के लिए सेना बुलाई गई है और वायुसेना के विमान भी आकाश से पानी गिरा रहे हैं। फ्रांस में हो रहे जी-7 देशों के शिखर सम्मेलन में इस संकट पर खासतौर से विचार किया गया और इसके समाधान के लिए तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की पेशकश की गई है।
पूरी दुनिया पर खतरा
आग सिर्फ ब्राजील के जंगलों में ही नहीं लगी है, बल्कि वेनेजुएला, बोलीविया, पेरू और पैराग्वे के जंगलों में भी लगी है। वेनेज़ुएला दूसरे नंबर पर है जहां आग की 2600 घटनाएं सामने आई हैंजबकि 1700 घटनाओं के साथ बोलीविया तीसरे नंबर पर है। ब्राजील में आग की घटनाओं का सबसे अधिक प्रभाव उत्तरी इलाक़ों में पड़ा है। घटनाओं में रोराइमा में 141%एक्रे में 138%रोंडोनिया में 115% और अमेज़ोनास में 81% वृद्धि हुई है, जबकि दक्षिण में मोटो ग्रोसो डूो सूल में आग की घटनाएं 114% बढ़ी हैं।

सोमवार, 26 अगस्त 2019

अंतरराष्ट्रीय फोरमों पर विफल पाकिस्तान


पिछले 72 साल में पाकिस्तान की कोशिश या तो कश्मीर को फौजी ताकत से हासिल करने की रही है या फिर भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की रही है। पिछले दो या तीन सप्ताह में स्थितियाँ बड़ी तेजी से बदली हैं। कहना मुश्किल है कि इस इलाके में शांति स्थापित होगी या हालात बिगड़ेंगे। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान की आंतरिक और बाहरी राजनीति किस दिशा में जाती है। पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तानी डीप स्टेट का रुख क्या रहता है।
विभाजन के दो महीने बाद अक्तूबर 1947 में फिर 1965, फिर 1971 और फिर 1999 में कम से कम चार ऐसे मौके आए, जिनमें पाकिस्तान ने बड़े स्तर पर फौजी कार्रवाई की। बीच का समय छद्म युद्ध और कश्मीर से जुड़ी डिप्लोमेसी में बीता है। हालांकि 1948 में संयुक्त राष्ट्र में इस मामले को लेकर भारत गया था, पर शीतयुद्ध के उस दौर में पाकिस्तान को पश्चिमी देशों का सहारा मिला। फिर भी समाधान नहीं हुआ।
चीनी ढाल का सहारा
इस वक्त पाकिस्तान एक तरफ चीन और दूसरी तरफ अमेरिका के सहारे अपने मंसूबे पूरे करना चाहता है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तानी डिप्लोमेसी को अमेरिका से झिड़कियाँ खाने को मिली हैं। इस वजह से उसने चीन का दामन थामा है। उसका सबसे बड़ा दोस्त या संरक्षक अब चीन है। अनुच्छेद 370 के सिलसिले में भारत सरकार के फैसले के बाद से पाकिस्तान ने राजनयिक गतिविधियों को तेजी से बढ़ाया और फिर से कश्मीर के अंतरराष्ट्रीयकरण पर पूरी जान लगा दी। फिलहाल उसे सफलता नहीं मिली है, पर कहानी खत्म भी नहीं हुई है।

गत 16 अगस्त को हुई सुरक्षा परिषद की एक बैठक में कोई औपचारिक प्रस्ताव जारी नहीं हुआ, पर पाकिस्तानी कोशिशें खत्म नहीं हुईं हैं। इस बैठक को भी पाकिस्तान अपनी उपलब्धि मानता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जगत में उसकी सुनवाई हुई है। बावजूद इसके कि बैठक में उपस्थित ज्यादातर देशों ने इसे दोनों देशों के बीच का मामला बताया है। यह बैठक अनौपचारिक थी और इसमें हुए विचार का कोई औपचारिक दस्तावेज जारी नहीं हुआ। यह पाकिस्तानी डिप्लोमेसी की पराजय थी। फिर भी इसमें कुछ बातें नई थीं।
यह बैठक चीनी पहल पर हुई थी। बैठक खत्म होने के बाद चीनी दूत ने अपनी प्रेस वार्ता में पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए ऐसा जताने का प्रयास किया कि भारतीय कार्रवाई से विश्व समुदाय चिंतित है। यह चीन सरकार का अपना नजरिया है। चूंकि कोई दस्तावेज जारी नहीं हुआ, इसलिए ज्यादातर बातें बैठक में उपस्थिति राजनयिकों के हवाले से सामने आई हैं। इनमें से कुछ बातें भारत की नजर से महत्वपूर्ण हैं।
वैश्विक समीकरण
बैठक में अमेरिका और फ्रांस ने भारत का साथ दिया और कहा कि अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मामला है, क्योंकि वह देश की सांविधानिक व्यवस्था से जुड़ा है। पर दो बातों पर गौर करें। पहले खबरें थीं कि ब्रिटेन ने इस बैठक में हुए विमर्श पर औपचारिक दस्तावेज जारी करने के चीनी सुझाव का समर्थन किया था। बाद में ब्रिटिश सरकार के सूत्रों ने स्पष्ट किया कि यह बात सही नहीं है। दूसरे रूसी दूत ने अपने ट्वीट में कुछ ऐसी बातें लिखीं, जिनसे संकेत मिलता है कि उसका परम्परागत रुख बदला है। रूस ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत इस समस्या के समाधान का सुझाव दिया है। हालांकि रूस और भारत के रिश्ते बहुत गहरे हैं, पर एक नए शीतयुद्ध का आग़ाज़ हो रहा है। रूस और चीन करीब आ रहे हैं। रूस की दिलचस्पी अफगानिस्तान में भी है। यूरोप के कई देश आर्थिक कारणों से चीन के करीब जा रहे हैं।
पाकिस्तान के पास कोई विकल्प नहीं है। वह सोशल मीडिया पर उल्टी-सीधी खबरें परोसकर गलतफहमियाँ पैदा करना चाहता है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने अपने स्वतंत्रतादिवस संदेश में यह बात कही भी है। उनकी रणनीति में फिलहाल बदलाव की संभावना नहीं है। अफगानिस्तान में शांति-समझौते की संभावनाओं से वह उत्साहित है। सबको इंतजार इस बात का है कि जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंध हटने के बाद के किस प्रकार के हालात बनेंगे। खबरें हैं कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी दस्ते फिर से जमा हो रहे हैं। पाकिस्तान पर एफएटीएफ के प्रतिबंधों का साया है। वह आतंकी संगठनों को किस हद तक बढ़ावा दे पाएगा, इसे देखना होगा। जम्मू-कश्मीर में यदि अव्यवस्था हुई, तो पाकिस्तान इसका फायदा जरूर उठाएगा। भारत सरकार कश्मीरी नागरिकों के मनोबल को बनाए रखने में सफल होगी या नहीं, यह ज्यादा बड़ा सवाल है।
पाकिस्तानी हुकूमत
पाकिस्तान में इमरान खान के कार्यकाल का एक साल पूरा हो गया है। माना जाता है कि उन्हें वहाँ की सेना ने प्रधानमंत्री बनाया है। इस हफ्ते देश के सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा का कार्यकाल तीन साल के लिए बढ़ा दिया गया है। इमरान खान ने नवाज शरीफ के दौर में जनरल राहील शरीफ का कार्यकाल को बढ़ाए जाने का विरोध किया था। उस वक्त राहील शरीफ ने खुद ही अपना हाथ खींच लिया था। अब कहा जा रहा है कि सुरक्षा के हालात देखते हुए यह फैसला किया गया है। इस फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। बहुत से फौजी अफसरों की प्रोन्नति के दरवाजे बंद हो गए हैं। बहुत जरूरी है कि पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति पर नजरें रखी जाएं।
भारतीय दृष्टिकोण से कश्मीर बड़ा मसला है। यह मोदी सरकार की राजनीति की भी बड़ी परीक्षा है। क्या वह वैश्विक मंच पर कश्मीर से जुड़े सवालों का जवाब देने की स्थिति में है? क्या अब भारत और पाकिस्तान के बीच सीधी बातचीत होगी? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सन 1957 के बाद कश्मीर पर कोई विचार नहीं हुआ। सन 1971 के युद्ध के बाद एकबार कश्मीर का जिक्र हुआ, पर 1972 में शिमला समझौता होने के बाद कई साल तक पाकिस्तान ने चुप्पी रखी।
नब्बे के दशक में पाकिस्तान ने अफ़ग़ान-जेहाद की आड़ में कश्मीर में हिंसा को बढ़ावा दिया और संरा महासभा में कश्मीर का जिक्र फिर से करना शुरू कर दिया। सन 1998 में दोनों देशों ने एटमी धमाके किए, लाहौर यात्रा भी हुई, करगिल हुआ, इंडियन एयरलाइंस के विमान का अपहरण हुआ, भारतीय संसद पर हमला हुआ और फिर आगरा शिखर सम्मेलन भी हुआ। सन 2003 में दोनों देशों के बीच नियंत्रण रेखा पर गोलाबारी रोकने का समझौता हुआ, जिसके कारण माहौल एकदम से बदला।
बात क्यों नहीं होती?
सन 2004 में भारत में यूपीए सरकार बनने के बाद यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी और लगता था कि दोनों देश शांति का कोई फॉर्मूला तैयार कर लेंगे। इसे मुशर्रफ-मनमोहन फॉर्मूला कहा गया, जिसमें अनौपचारिक रूप से इस बात पर सहमति बनने लगी थी कि कोई नई सीमा रेखा नहीं खिंचेगी। नियंत्रण रेखा अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा हो जाएगी। लोगों तथा सामग्रियों का नियंत्रण रेखा के आर-पार मुक्‍त आवागमन होगा। नियंत्रण रेखा पर सड़क मार्ग से आवागमन और व्यापार की शुरुआत भी हो गई।
यह शांति-प्रक्रिया आगे बढ़ती उसके पहले ही नवम्बर, 2008 में मुम्बई पर हमला हो गया। इसके बाद से किसी न किसी रूप में टकराव बढ़ता ही गया है। पाकिस्तान की आंतरिक सत्ता के दो केन्द्र होने की वजह से ऐसा हुआ। क्या इस वक्त सत्ता के दोनों केन्द्र एक पेज पर हैं?  इसका जवाब देना मुश्किल है। बुधवार 14 अगस्त को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने पाक अधिकृत कश्मीर की असेम्बली के एक विशेष अधिवेशन में कहा, कश्मीर को लेकर युद्ध हुआ, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय जिम्मेदार होगा।
इमरान ने कहा, हमने यूएन में याचिका डाली है। अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाएंगेदुनिया के हर मंच पर जाएंगे। हमने दुनिया भर में मौजूद पाकिस्तानी और कश्मीरी समुदाय को इकट्ठा किया है। लंदन में कश्मीर के लिए ऐतिहासिक संख्या में लोग बाहर निकलेंगे। अगले महीने संयुक्त राष्ट्र महासभा में इतने लोग आपको दिखेंगे जितने पहले कभी नहीं देखे होंगे। सुरक्षा परिषद में भारतीय राजनयिकों ने फौरी तौर पर स्थिति को संभाल लिया है, पर वास्तविक विमर्श अब होगा।
अमेरिका की भूमिका
संरा सुरक्षा परिषद की बैठक के अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों से टेलीफोन पर बात की है। अमेरिका फिलहाल अफगानिस्तान को लेकर व्यस्त है। इस वजह से वह पाकिस्तान को हाथ से निकलने नहीं देगा, पर इसका मतलब यह नहीं है कि वह भारत से दूरी बनाएगा। भारतीय राजनय के सामने अमेरिका और चीन के अंतर्विरोधों को सुलझाने की जिम्मेदारी भी है।
पाकिस्तान के कारण यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि चीन, भारतीय दृष्टिकोण का समर्थन करेगा। दूसरी तरफ अमेरिका का दृष्टिकोण प्रत्यक्षतः भारत के पक्ष में है, पर दोनों देशों के सामरिक रिश्तों में इन दिनों ठहराव है। यह ठहराव शस्त्रास्त्र की खरीद के कारण है। अमेरिका ने रूस से हवाई रक्षा प्रणाली एस-400 की खरीद पर आपत्ति व्यक्त की है। भारत ने शस्त्रास्त्र की खरीद का दायरा बढ़ाया है। अब हम केवल रूस पर आश्रित नहीं हैं, पर वर्तमान सैन्य उपकरणों में से ज्यादातर रूसी हैं। उन्हें एकदम से बदला नहीं जा सकता।
अमेरिका की हिंद-प्रशांत नीति में भारत की केंद्रीय भूमिका है। चीनी उभार रोकने के लिए जापानऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के साथ चतुष्कोणीय रक्षा सहयोग या क्वाड में भी भारत शामिल है। पर हम हाथ बचाकर चल रहे हैं। क्वाड के लक्ष्य अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच सैनिक समन्वय और सहयोग के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण ‘कम्युनिकेशंसकंपैटिबिलिटीसिक्योरिटी एग्रीमेंट (कोमकासा)’ हो जाने के बाद यह साफ हो गया था कि दोनों के रिश्ते काफी गहराई तक जा चुके हैं।
हाल में अमेरिका ने भारत को नेटो सहयोगी के स्तर का दर्जा देने का इरादा जाहिर किया था, पर अमेरिकी संसद ने उस दर्जे को अपेक्षित स्तर से कम ही रखा है। अब दोनों देशों के बीच बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) की चर्चा है, जिसपर पिछले साल सितंबर में दोनों देशों के बीच हुई टू प्लस टू वार्ता में विचार हुआ था। यह समझौता दोनों देशों के सामरिक समझौतों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
अमेरिका के साथ सामरिक सहयोग और उसके अंतर्विरोध पाकिस्तान के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कश्मीर को लेकर वैश्विक संवाद में अमेरिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। भारत पूरी तरह अमेरिकी पाले में खड़ा होने से बचता है। यही द्वंद्व सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और ईरान के अंतर्विरोधों के रूप में प्रकट होता है। इसे भारतीय राजनय की सफलता कहा जाएगा कि सऊदी अरब और यूएई और यहाँ तक कि इस्लामिक देशों के संगठन ने भी कश्मीर के संदर्भ में ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे भारत विचलित हो।
सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव
कश्मीर में जनमत संग्रह को लेकर बहुत गलतफहमियाँ हैं। मामले को संयुक्त राष्ट्र में भारत लेकर गया था न कि पाकिस्तान। यह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी फोरम पर कभी नहीं उठा। भारत की सदाशयता के कारण पारित सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के एक अंश को पाकिस्तान आज तक रह-रहकर उठाता रहा हैपर पूरी स्थिति को कभी नहीं बताता। 13 अगस्त 1948 के प्रस्ताव को लागू कराने को लेकर वह संज़ीदा था तो तभी पाकिस्तानी सेना वापस क्यों नहीं चली गई?  प्रस्ताव के अनुसार पहला काम उसे यही करना था।
संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव अपनी मियाद खो चुका है और महत्व भी। सुरक्षा परिषद दिसम्बर 1948 में ही मान चुकी थी कि पाकिस्तान की दिलचस्पी सेना हटाने में नहीं है तो इसे भारत पर भी लागू नहीं कराया जा सकता। दूसरे यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 35 के तहत दोनों पक्षों की सहमति से तैयार हुआ था। यह बाध्यकारी प्रस्ताव नहीं है। पाकिस्तान ने अब जो अनुरोध सुरक्षा परिषद से किया है, वह भी अनुच्छेद 35 के तहत है।
जून 1972 के शिमला समझौते की तार्किक परिणति थी कि पाकिस्तान को इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना बंद कर देना चाहिए था। शिमला में औपचारिक रूप से पाकिस्तान ने इस बात को मान लिया कि दोनों देश आपसी बातचीत से इस मामले को सुलझाएंगे। पाकिस्तानी नेताओं ने लम्बे अरसे तक इस सवाल को उठाना बंद रखापर पिछले एक दशक से उन्होंने इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना शुरू किया है।
समाचार एजेंसी रायटर ने 18 दिसम्बर 2003 को परवेज़ मुशर्रफ के इंटरव्यू पर आधारित समाचार जारी कियाजिसमें उन्होंने कहा, ‘हमारा देश संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव कोकिनारे रख चुका है (लेफ्ट एसाइड) और कश्मीर समस्या के समाधान के लिए आधा रास्ता खुद चलने को तैयार है।’ यह बात आगरा शिखर वार्ता (14-16 जुलाई 2001) के बाद की है।
अमित शाह की घोषणा
संसद में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक पर चर्चा के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर भी हमारा है और उसे हमें वापस लेना है। इसके पहले फरवरी 1994 में भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास करकेकहा था कि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग रहा हैऔर रहेगा तथा उसे देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के किसी भी प्रयास का विरोध किया जाएगा। पाकिस्तान बल पूर्वक कब्जाए हुए क्षेत्रों को खाली करे।
इस प्रस्ताव को पास कराने के पीछे एक उद्देश्य राष्ट्रीय आमराय बनाना था, वहीं अमेरिका सरकार की एक मुहिम को अस्वीकार करना था। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कश्मीर को अलग स्वतंत्र देश बनाने की एक योजना बनाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव की 1994 की अमेरिका यात्रा के पहले ही भारतीय संसद का यह प्रस्ताव पास हो गया।
दूसरी तरफ व्यावहारिक सत्य यह भी है कि नियंत्रण रेखा पर आवागमन को स्वीकार करके एक प्रकार से भारत सरकार ने उधर के कश्मीर के अस्तित्व को स्वीकार करना शुरू कर दिया था। 13 अप्रैल 1956 को जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, “मैं मानता हूँ कि युद्ध विराम रेखा के पार का इलाका आपके पास रहे। हमारी इच्छा लड़ाई लड़कर उसे वापस लेने की नहीं है।
भारत की वर्तमान कश्मीर नीति में अभी और आक्रामकता देखने को मिलेगी। यही आक्रामकता नाभिकीय शस्त्रों से जुड़े नो फर्स्ट यूज़ सिद्धांत के साथ जुड़ी है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का बयान अनायास नहीं आया है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान इस मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण से कुछ हासिल करने में सफल होगा? उसे चीनी समर्थन मिलने के बावजूद लगता नहीं कि उसे सफलता मिलेगी। चीन ने भी दोनों सीधी बातचीत से विवाद को सुलझाने का सुझाव दिया है।
पाकिस्तानी नेताओं के उन्मादी बयान अपने देश की जनता को भरमाने के लिए भी हैं। पाकिस्तानी अखबार डॉन ने इस बात को अपने संपादकीय में स्वीकार किया है। अखबार ने लिखा है, दुनिया ने पाकिस्तान की गुहार पर वैसी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की, जिसकी उम्मीद थी, बल्कि अमेरिका और यूएई ने तो भारत की इस बात को माना है कि यह उसका आंतरिक मामला है।
इमरान खान के उन्मादी भाषण के अलावा भी खबरें हैं कि पाकिस्तान ने स्कर्दू हवाई अड्डे पर उपकरणों को पहुँचाना शुरू कर दिया है। खबरें यह भी हैं कि उसने वहाँ अपने जेएफ-17 विमान तैनात किए हैं। अपनी पश्चिमी सीमा से सैनिकों को हटाकर पूर्वी सीमा पर लाना शुरू कर दिया है वगैरह। पर वास्तव में पाकिस्तान की स्थिति इस समय सैनिक कार्रवाई करने की नहीं है। सारा शोर-शराबा अंतरराष्ट्रीय समुदाय और अपने देश की जनता का ध्यान खींचने के लिए है।

रविवार, 11 अगस्त 2019

पाकिस्तान ने 15 अगस्त से मुँह क्यों मोड़ा?


भारत और पाकिस्तान अपने स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं। दोनों को स्वतंत्रता दिवस अलग-अलग तारीखों को मनाए जाते हैं। सवाल है कि भारत 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ, तो क्या पाकिस्तान उसके एक दिन पहले आजाद हो गया था? इसकी एक वजह यह बताई जाती है कि माउंटबेटन ने दिल्ली रवाना होने के पहले 14 अगस्त को ही मोहम्मद अली जिन्ना को शपथ दिला दी थी। दिल्ली का कार्यक्रम मध्यरात्रि से शुरू हुआ था।
शायद इस वजह से 14 अगस्त की तारीख को चुना गया, पर व्यावहारिक रूप से 14 अगस्त को पाकिस्तान बना ही नहीं था। दोनों ही देशों में स्वतंत्रता दिवस के पहले समारोह 15 अगस्त, 1947 को मनाए गए थे। सबसे बड़ी बात यह है कि स्वतंत्रता दिवस पर मोहम्मद अली जिन्ना ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा, स्वतंत्र और सम्प्रभुता सम्पन्न पाकिस्तान का जन्मदिन 15 अगस्त है।
14 अगस्त को पाकिस्तान जन्मा ही नहीं था, तो वह 14 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस क्यों मनाता है? 14 अगस्त, 1947 का दिन तो भारत पर ब्रिटिश शासन का आखिरी दिन था। वह दिन पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस कैसे हो सकता है? सच यह है कि पाकिस्तान ने अपना पहला स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त, 1947 को मनाया था और पहले कुछ साल लगातार 15 अगस्त को ही पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया। पाकिस्तानी स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगाँठ के मौके पर जुलाई 1948 में जारी डाक टिकटों में भी 15 अगस्त को स्वतंत्रता पाकिस्तानी दिवस बताया गया था। पहले चार-पाँच साल तक 15 अगस्त को ही पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था।
अलग दिखाने की चाहत
अपने को भारत से अलग दिखाने की प्रवृत्ति के कारण पाकिस्तानी शासकों ने अपने स्वतंत्रता दिवस की तारीख बदली, जो इतिहास सम्मत नहीं है। पाकिस्तान के एक तबके की यह प्रवृत्ति सैकड़ों साल पीछे के इतिहास पर भी जाती है और पाकिस्तान के इतिहास को केवल इस्लामी इतिहास के रूप में ही पढ़ा जाता है। पाकिस्तान के अनेक लेखक और विचारक इस बात से सहमत नहीं हैं, पर एक कट्टरपंथी तबका भारत से अपने अलग दिखाने की कोशिश करता है। स्वतंत्रता दिवस को अलग साबित करना भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है।

रविवार, 26 मई 2019

विदेश-नीति के चार आयाम


बदलते वैश्विक-परिदृश्य में नई सरकार की चुनौतियाँ
अगले कुछ दिनों में देश की नई सरकार का गठन हो जाएगा। देश इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करने वाला है। हमारे लोकतंत्र की विशेषता है कि उसमें निरंतरता और परिवर्तन दोनों के रास्ते खुले हैं। विदेश-नीति ऐसा क्षेत्र है, जिसमें निरंतरता और प्रवाह की जरूरत ज्यादा होती है। सन 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के काफी पहले हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व ने भावी विदेश-नीति के कुछ बुनियादी सूत्रों को स्थिर किया था, जो किसी न किसी रूप में आज भी कायम हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है असंलग्नता की नीति। हम किसी के पिछलग्गू देश नहीं हैं, और किसी से हमारा स्थायी वैर भी नहीं है। अपने आकार, सांस्कृतिक वैभव और भौगोलिक महत्व के कारण हम हमेशा दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में गिने गए।
सच यह है कि हम विदेश-नीति से जुड़े मसलों को कॉज़्मेटिक्स या बाहरी दिखावे तक ही महत्व देते हैं। उसकी गहराई पर नहीं जाते। हाल में हुए लोकसभा-चुनाव में पुलवामा से लेकर मसूद अज़हर का नाम कई बार लिया गया, पर विदेश-नीति चुनाव का मुद्दा नहीं थी। इसकी बड़ी वजह यह है कि विदेश-नीति का आयाम हम राष्ट्रीय-सुरक्षा के आगे नहीं देखते हैं। आर्थिक-विकास भी काफी हद तक विदेश-नीति से जुड़ा है। गोकि हमारी अर्थ-व्यवस्था चीन की तरह निर्यातोन्मुखी नहीं है, फिर भी बेरोजगारी, सार्वजनिक स्वास्थ्य, परिवहन, आवास, विज्ञान और तकनीक जैसे तमाम मसलों का विदेश-नीति से रिश्ता है।
भारत जैसे देशों के सामने सवाल है कि आर्थिक विकास, व्यक्तिगत उपभोग और गरीबी उन्मूलन के बीच क्या कोई सूत्र है? पिछले डेढ़-दो सौ साल में दुनिया की समृद्धि बढ़ी, पर असमानता कम नहीं हुई, बल्कि बढ़ी। ऐसा क्यों हुआ और रास्ता क्या है? सन 2015 का सहस्राब्दी लक्ष्यों के पूरा होने का साल था। उन्नीसवीं सदी के अंत में संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले दुनिया ने लोगों को दरिद्रता के अभिशाप से बाहर निकालने का संकल्प किया था। वह संकल्प पूरा नहीं हो पाया। अब उसके लिए सन 2030 का लक्ष्य रखा गया है।
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