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शनिवार, 4 मई 2019

मसूद अज़हर पर चीनी अड़ंगा हटने से हालात बदलेंगे

चीन ने मसूद अज़हर के मामले पर सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव पर लगाई अपनी आपत्ति हटा ली है। इसके बाद मसूद अज़हर अब घोषित आतंकवादी है। चीन-भारत रिश्तों के लिहाज से यह महत्वपूर्ण घटना है साथ ही पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों पर भी इसका असर पड़ेगा। इमरान खान की हाल की चीन यात्रा के दौरान शी चिनफिंग ने इस बात की उम्मीद जाहिर की कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में सुधार होगा। दक्षिण एशिया की प्रगति और विकास के लिए यह जरूरी भी है। दक्षिण एशिया के देशों के बीच सम्पर्क तबतक ठीक नहीं होगा, जबतक भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बेहतर नहीं होंगे। फरवरी में पुलवामा कांड के बाद चीन ने अपने उप विदेश मंत्री शुआनयू को पाकिस्तान भेजा था, ताकि तनाव बढ़ने न पाए। चीन को लेकर भारत में एक खास तरह की चिंता हमेशा रहती है। पकिस्तान के प्रति उसका झुकाव बी जाहिर है। क्या वह अपने इस झुकाव को कम करेगा? क्या वह संतुलन स्थापित करेगा? लोकसभा चुनाव के बाद ऐसे सवाल फिर से विमर्श का विषय बनेंगे।

इस बीच चीन ने अरबों डॉलर की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना से बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे को हटा दिया है। बीसीआईएम को हटाए जाने के कारणों के बारे में तत्काल कुछ नहीं बताया गया है, लेकिन अप्रैल के अंतिम सप्ताह में आयोजित बेल्ट एंड रोड फोरम के दूसरे शिखर सम्मेलन में जारी सूची में जिन परियोजनाओं का जिक्र किया गया है, उनमें इस गलियारे का उल्लेख नहीं है। भारत ने बेल्ट एंड रोड के तहत बन रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करते हुए इस कार्यक्रम से अपनी दूरी बना रखी है और इसके दूसरे सम्मेलन में भी उसने भाग नहीं लिया। अनुमान लगाया जा सकता है कि इस विरोध की खीझ में चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे (बीसीआईएम) को लिस्ट से बाहर कर दिया है।

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

श्रीलंका में दाएश का हमला समूचे भारतीय-भूखंड के लिए सबक और चेतावनी


सीरिया में पिटाई के बाद लगता था कि इस्लामिक स्टेट कहीं न कहीं सिर उठाएगा। उसे अपनी उपस्थिति का एहसास कराना है। श्रीलंका में रविवार को हुई हिंसा की जिम्मेदारी लेकर उसने इस बात को साबित किया है। अभी तक दक्षिण एशिया उसके निशाने से बचा हुआ था। यों 2016 में बांग्लादेश की घटनाओं के बाद कहा गया था कि वहाँ इस्लामिक स्टेट जड़ें जमा रहा है। कश्मीर घाटी में अक्सर उसके काले झंडे नजर आते हैं। फिर भी इस्लामिक स्टेट के खतरे को बहुत गम्भीरता से नहीं देखा गया। श्रीलंका की हिंसा भारत के लिए ही नहीं दक्षिण एशिया के सभी देशों के लिए चेतावनी है।
श्रीलंका में तकरीबन दस साल से चली आ रही शांति जिस भयानक हत्याकांड से भंग हुई है, वह समूचे भारत-भूखंड के लिए खतरे की घंटी है। दुनिया की सबसे बहुरंगी-बहुल संस्कृति वाला समाज इसी इलाके में रहता है। करीब तीन दशक तक चले तमिल-गृहयुद्ध के बाद उम्मीद थी कि श्रीलंका के निवासी जातीय-साम्प्रदायिक आधारों पर अपने आपको बाँटने के बजाय सामूहिक सुख-समृद्धि के रास्ते तैयार करेंगे। इन कोशिशों को तोड़ने के प्रयास अब फिर शुरू हो गए हैं। बहरहाल श्रीलंका की प्रशासनिक-व्यवस्था ने इस हिंसा के बाद सम्भावित टकराव को रोकने में सफलता हासिल की है।

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

नफरत और आतंक का एक नया चेहरा

न्यूज़ीलैंड को दुनिया के सबसे शांत देशों में एक माना जाता है। वहाँ पिछले 15 मार्च को क्राइस्टचर्च की दो मस्जिदों में हुए हत्याकांड ने दो तरह के संदेश एकसाथ दुनिया को दिए। इस घटना ने गोरे आतंकवाद के एक नए खतरे की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है। दूसरी तरफ न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न और वहाँ की सरकार ने जिस तरह से अपने देश की मुस्लिम आबादी के प्रति अपने समर्थन और एकजुटता का परिचय दिया उसकी दुनियाभर में तारीफ हो रही है। ऐसे वक्त में जब दुनिया को साम्प्रदायिक नफरतों की आँधियों ने घेर रखा है, उनके इस व्यवहार ने इस हत्याकांड से जन्मी पीड़ा को कुछ कम किया है। खासतौर से मुस्लिम समुदाय ने इस महिला की जबर्दस्त तारीफ की है।

जैसिंडा अर्डर्न के प्रति प्रतीक रूप में सम्मान व्यक्त करते हुए संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी विश्व-प्रसिद्ध इमारत बुर्ज खलीफा में शुक्रवार की रात उनकी तस्वीर प्रदर्शित की, जिसमें हिजाब लगाए वे एक व्यक्ति को गले लगाती हुई दिखाई दे रही हैं। यूएई के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम ने अपने ट्वीट में लिखा, ‘आपने (पीड़‍ितों के प्रति) जिस तरह की एकजुटता प्रदर्शित की उसने दुनियाभर के 1.5 अरब मुसलमानों का दिल जीता है।

सीरिया में इस्लामिक स्टेट की हार के बावजूद सवाल ही सवाल हैं


सीरिया में इस्लामिक स्टेट के खात्मे का एलान अब सिर्फ औपचारिकता है। पूर्वी सीरिया का अलबाग़ूज़ क़स्बा आइसिस उर्फ आईएस या दाएश का आख़िरी ठिकाना था, जिसपर अब पश्चिमी देशों की सेनाओं का कब्ज़ा हो गया है या हो जाएगा। इस्लामिक स्टेट के सैनिकों और नेताओं ने या तो समर्पण कर दिया है या भाग निकले हैं। बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं। एक तरफ सीरिया में इस्लामिक स्टेट की पराजय की खबरें हैं, वहीं अफगानिस्तान और उत्तरी अफ्रीका में उनके सक्रिय होने के समाचार भी है। चुनौती उस व्यवस्था को कायम करने की है जिसमें इस गिरोह की वापसी फिर से न होने पाए।
अफ़ग़ानिस्तान में गुरुवार 7 मार्च को इस्लामी एकता पार्टी के नेता अब्दुल अली मज़ारी की बरसी के मौक़े पर आयोजित एक सभा में दाएश ने हमला किया। सभा में देश के मुख्य कार्याधिकारी अब्दुल्ला अब्दुल्ला सहित कई राजनीतिक हस्तियां शामिल थीं। शोक सभा स्थल के पास सिलसिलेवार बम धमाकों के कारण बरसी का कार्यक्रम अधूरा छोड़ दिया गया था। इसमें कम से कम 11 लोग मरे और 95 के घायल होने की खबरें हैं। ऐसी खबरें पश्चिम एशिया के कई इलाकों से मिल रहीं हैं।
मित्र देशों की असहमति
उधर पश्चिमी देशों में इस बात पर सहमति नहीं बन पाई है कि पूर्वी सीरिया की सुरक्षा अब कैसे की जाएगी। अमेरिका ने अपने आठ मित्र देशों से कहा था कि वे शुक्रवार 8 मार्च तक इस बात की जानकारी दे दें कि कितनी जिम्मेदारी निभाएंगे, पर ऐसा हुआ नहीं। इन देशों में ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी सबसे प्रमुख हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दिसम्बर में कहा था कि हमारी सेनाएं अब सीरिया से हट जाएंगी। इस घोषणा की अमेरिका के भीतर आलोचना हुई और सेना की फौरी वापसी रुक गई। अब अमेरिका कोशिश कर रहा है कि मित्र देशों के साथ मिलकर कोई व्यवस्था बने। इस व्यवस्था में यूरोप के मित्र देशों के अलावा कुर्दों के नेतृत्व में गठित सीरियन डेमोक्रेटिक फ़ोर्सेज़ (एसडीएफ) तथा तुर्की की भूमिका होगी। इसमें भी अड़चन है। तुर्की की नजर में एसडीएफ भी आतंकवादी संगठन है।

आतंकी संगठनों पर नकेल डालने में क्या कामयाब होगा पाकिस्तान?


पुलवामा कांड के बाद से पाकिस्तान पर अपने उन कट्टरपंथी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव है, जो संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल हैं। पिछले महीने फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक में भी पाकिस्तान से कहा गया था कि वह जल्द से जल्द कार्रवाई करे, वरना उसका नाम काली सूची में डाल दिया जाएगा। इन दबावों के कारण सोमवार 4 मार्च को पाकिस्तान सरकार ने उन सभी संगठनों की सम्पत्ति पर कब्जा करने की घोषणा की है, जिनके नाम संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध सूची में हैं। इसके बाद भारत ने संकेत दिए हैं कि इन कदमों के मद्देनज़र हम फौजी कार्रवाई के इरादे को त्याग रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (प्रतिबंध और ज़ब्ती) आदेश, 2019 पाकिस्तान के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अधिनियम, 1948 के तहत है। इन संगठनों से जुड़े सभी धर्मादा (दातव्य) संगठनों की सम्पदा भी सरकारी कब्जे में चली जाएगी। जैश के चीफ मसूद अज़हर पर कोई कार्रवाई होगी या नहीं, अभी यह स्पष्ट नहीं है। इसकी वजह यह है कि संरा सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध परिषद के प्रस्ताव 1267 में उनका नाम नहीं है। पाकिस्तान के विदेश विभाग के एक प्रवक्ता ने इस आदेश की जानकारी पत्रकारों को देते हुए बताया कि यह आदेश संरा सुरक्षा परिषद और पेरिस स्थित एफएटीएफ के निर्देशों के अनुरूप है।
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