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शनिवार, 27 अप्रैल 2019

सूडान में फौजी शासकों पर जनता का भारी दबाव

सूडान में लोकतांत्रिक आंदोलन अपनी तार्किक परिणति की ओर बढ़ रहा है। पिछले कुछ महीनों से चल रहे आंदोलन के बाद 32 साल से कुर्सी पर जमे बैठे सूडान के स्वयंभू शासक उमर अल-बशीर को गद्दी छोड़नी पड़ी है, पर उनके स्थान पर फौजी कौंसिल ने सत्ता हथिया ली है। देश की युवा आबादी आंदोलन की अगली कतार में खड़ी है और सेना पर लगातार दबाव बना रही है कि वह भी रास्ते से हटे। सेना के साथ नागरिकों की लगातार बातचीत चल रही है। सेना ने तत्काल नागरिक शासन की उनकी मांग को मानने से इनकार कर दिया है, जिसके कारण पिछले रविवार को बातचीत एक मोड़ पर आकर ठहर गई है।

जनता के प्रतिनिधियों का कहना है कि सेना नागरिक परिषद को सत्ता सौंप दे। आंदोलनकारी सूडानी प्रोफेशनल्स एसोसिएशन (एसपीए) के प्रवक्ता मोहम्मद अल-अमीन ने सेना परिसर में जमा हजारों प्रदर्शनकारियों की भीड़ को बताया कि हम फौजी कौंसिल के साथ अपनी बातचीत स्थगित कर रहे हैं, पर हमारा धरना-प्रदर्शन जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि हमारी लड़ाई खत्म नहीं हुई है, क्योंकि फौजी कौंसिल बशीर की बेदखल सरकार से कोई खास अलग नहीं है। फौजी अफसरों की दिलचस्पी लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने में नहीं है।

देश के नए फौजी शासक लेफ्टिनेंट जनरल अब्देल फ़तह अल-बुरहान ने रविवार को सरकारी टेलीविजन पर कहा कि हम जनता के हाथों में सत्ता सौंपने को तैयार हैं, पर अराजकता के इस दौर में नहीं। अभी व्यवस्था को कायम होने देना चाहिए। हमें सत्ता को कोई मोह नहीं है, हम इससे चिपके नहीं रहेंगे। हम चाहते हैं कि आंदोलनकारी कोई ऐसा प्रस्ताव पेश करें, जिसे स्वीकार किया जा सके।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सैनिक नेतृत्व की दरअसल हमारी बातों में दिलचस्पी है ही नहीं। इसमें शामिल लोग वही हैं, जो अब तक सत्ता में बैठे थे। वे नई व्यवस्था क्यों चाहेंगे? हमारे पास अब आंदोलन को तेज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अमेरिका की उस सूची में सूडान का नाम भी है, जिसमें आतंकवादी देशों के नाम दर्ज हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि फौजी शासन हटे, तो इस सूची से सूडान का नाम हट सकता है। इस सिलसिले में बातचीत के लिए सूडानी नागरिकों का एक दल अमेरिका जाने वाला है। सूडान के इस आंदोलन को अमेरिकी मीडिया का समर्थन भी मिल रहा है।

हालांकि प्रदर्शनकारियों में बहुत से नौजवान इस बात से खुश हैं कि फौजी शासक जनता को सत्ता सौंपने को तैयार हैं, पर उनके समझदार नेताओं का कहना है कि ये बातें समय काटने और भरमाने के लिए की जा रही हैं। सेना इस बात के लिए भी तैयार है कि किसी असैनिक को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया जाए, पर वह सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी छोड़ने को तैयार नहीं है। आंदोलनकारी इस मामले में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की मदद लेने को तैयार भी नहीं हैं। इन दोनों देशों ने तीन अरब डॉलर की सहायता देने की पेशकश की है। इसपर आंदोलनकारियों ने कहा कि हमें सऊदी समर्थन नहीं चाहिए। आप अपना पैसा अपने पास रखें। अल जजीरा ने एक स्थानीय कारोबारी को उधृत किया है कि हम अपने देश का निर्माण अपने साधनों से कर लेंगे। हमें अच्छा नेतृत्व चाहिए विदेशी सहायता नहीं। जिस वक्त उमर अल-बशीर हमारे लोगों की हत्या कर रहा था, तब ये देश क्यों नहीं बोले?

इसके पहले सऊदी अरब और यूएई ने कहा था कि हम 50 करोड़ डॉलर सूडान के केन्द्रीय बैंक में जमा कर देंगे, जिससे सूडानी पौंड पर दबाव कम हो जाएगा और मुद्रा-विनिमय की दिक्कतें दूर हो जाएंगी। सहायता से जुड़ी शेष धनराशि भोजन, औषधियों, ईंधन वगैरह पर खर्च की जा सकती है। आंदोलनकारियों को लगता है कि यह सब फौजी शासन को बचाने की चाल है।

बुधवार, 24 अप्रैल 2019

सूडान और अल्जीरिया में सत्ता-परिवर्तन

बहार-ए-अरब राउंड-2

सूडान और अल्जीरिया में एक साथ हुए सत्ता-परिवर्तनों ने सन 2011 के बहार-ए-अरब यानी अरब स्प्रिंग की याद ताजा कर दी। संयोग से दोनों जनांदोलनों में सोशल मीडिया ने जबर्दस्त भूमिका निभाई है। पहले अल्जीरिया के अब्देल अजीज बूतेफ़्लीका की छुट्टी हुई और उसके बाद सूडान के उमर अल-बशीर का पतन हुआ। इन दोनों देशों के अलावा हाल में ट्यूनीशिया और मोरक्को में भी आंदोलनों ने फिर से सिर उठाया है। सन 2001 की बहार-ए-अरब के पीछे ट्यूनीशिया के एक नौजवान के आत्मदाह की भूमिका थी, जिसकी खबर सोशल मीडिया पर कानो-कान पूरे मगरिब और मशरिक में फैल गई थी। इसबार ट्रिगर पॉइंट कोई एक घटना नहीं है, पर लम्बे अरसे से सत्ता हथियाए लोगों के प्रति जनता की बेचैनी का इज़हार यह जरूर है। इस अभियान को भी सोशल-मीडिया की क्रांति कहा जा रहा है।

इस अभियान ने सूडान के तख्त पर 32 साल से जमे बैठे ताकतवर तानाशाह उमर अल-बशीर को गद्दी छोड़ने को मजबूर कर दिया है। इन्हीं अल-बशीर के नेतृत्व में सूडानी सेना ने इक्कीसवीं सदी के शुरू में दारफुर में भयावह नरमेध को अंजाम दिया था। उनकी उसी सेना को अब अपने मुखिया को गिरफ्तार करने पर मजबूर होना पड़ा। इलाके की युवा आबादी इन आंदोलनों की अगली कतार में खड़ी है और सेना पर लगातार दबाव बना रही है कि वह भी रास्ते से हटे। सन 2011 के आंदोलनों ने इस इलाके के चार बड़े तानाशाहों का तख्ता पलटा था। तब पूरे इलाके में जनता के बीच अपनी व्यवस्था को लेकर बहस शुरू हुई थी, जिसकी तार्किक परिणति अब नजर आ रही है, गोकि यह भी एक चरण है।
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