बहार-ए-अरब राउंड-2
सूडान और अल्जीरिया में एक साथ हुए सत्ता-परिवर्तनों ने सन 2011 के बहार-ए-अरब यानी अरब स्प्रिंग की याद ताजा कर दी। संयोग से दोनों जनांदोलनों में सोशल मीडिया ने जबर्दस्त भूमिका निभाई है। पहले अल्जीरिया के अब्देल अजीज बूतेफ़्लीका की छुट्टी हुई और उसके बाद सूडान के उमर अल-बशीर का पतन हुआ। इन दोनों देशों के अलावा हाल में ट्यूनीशिया और मोरक्को में भी आंदोलनों ने फिर से सिर उठाया है। सन 2001 की बहार-ए-अरब के पीछे ट्यूनीशिया के एक नौजवान के आत्मदाह की भूमिका थी, जिसकी खबर सोशल मीडिया पर कानो-कान पूरे मगरिब और मशरिक में फैल गई थी। इसबार ट्रिगर पॉइंट कोई एक घटना नहीं है, पर लम्बे अरसे से सत्ता हथियाए लोगों के प्रति जनता की बेचैनी का इज़हार यह जरूर है। इस अभियान को भी सोशल-मीडिया की क्रांति कहा जा रहा है।
इस अभियान ने सूडान के तख्त पर 32 साल से जमे बैठे ताकतवर तानाशाह उमर अल-बशीर को गद्दी छोड़ने को मजबूर कर दिया है। इन्हीं अल-बशीर के नेतृत्व में सूडानी सेना ने इक्कीसवीं सदी के शुरू में दारफुर में भयावह नरमेध को अंजाम दिया था। उनकी उसी सेना को अब अपने मुखिया को गिरफ्तार करने पर मजबूर होना पड़ा। इलाके की युवा आबादी इन आंदोलनों की अगली कतार में खड़ी है और सेना पर लगातार दबाव बना रही है कि वह भी रास्ते से हटे। सन 2011 के आंदोलनों ने इस इलाके के चार बड़े तानाशाहों का तख्ता पलटा था। तब पूरे इलाके में जनता के बीच अपनी व्यवस्था को लेकर बहस शुरू हुई थी, जिसकी तार्किक परिणति अब नजर आ रही है, गोकि यह भी एक चरण है।
सूडान और अल्जीरिया में एक साथ हुए सत्ता-परिवर्तनों ने सन 2011 के बहार-ए-अरब यानी अरब स्प्रिंग की याद ताजा कर दी। संयोग से दोनों जनांदोलनों में सोशल मीडिया ने जबर्दस्त भूमिका निभाई है। पहले अल्जीरिया के अब्देल अजीज बूतेफ़्लीका की छुट्टी हुई और उसके बाद सूडान के उमर अल-बशीर का पतन हुआ। इन दोनों देशों के अलावा हाल में ट्यूनीशिया और मोरक्को में भी आंदोलनों ने फिर से सिर उठाया है। सन 2001 की बहार-ए-अरब के पीछे ट्यूनीशिया के एक नौजवान के आत्मदाह की भूमिका थी, जिसकी खबर सोशल मीडिया पर कानो-कान पूरे मगरिब और मशरिक में फैल गई थी। इसबार ट्रिगर पॉइंट कोई एक घटना नहीं है, पर लम्बे अरसे से सत्ता हथियाए लोगों के प्रति जनता की बेचैनी का इज़हार यह जरूर है। इस अभियान को भी सोशल-मीडिया की क्रांति कहा जा रहा है।
इस अभियान ने सूडान के तख्त पर 32 साल से जमे बैठे ताकतवर तानाशाह उमर अल-बशीर को गद्दी छोड़ने को मजबूर कर दिया है। इन्हीं अल-बशीर के नेतृत्व में सूडानी सेना ने इक्कीसवीं सदी के शुरू में दारफुर में भयावह नरमेध को अंजाम दिया था। उनकी उसी सेना को अब अपने मुखिया को गिरफ्तार करने पर मजबूर होना पड़ा। इलाके की युवा आबादी इन आंदोलनों की अगली कतार में खड़ी है और सेना पर लगातार दबाव बना रही है कि वह भी रास्ते से हटे। सन 2011 के आंदोलनों ने इस इलाके के चार बड़े तानाशाहों का तख्ता पलटा था। तब पूरे इलाके में जनता के बीच अपनी व्यवस्था को लेकर बहस शुरू हुई थी, जिसकी तार्किक परिणति अब नजर आ रही है, गोकि यह भी एक चरण है।
