बांग्लादेश में जो
चुनाव परिणाम आए हैं, उनके बारे में किसी ने नहीं सोचा था। अवामी लीग के नेतृत्व
में बने महाजोट (ग्रैंड एलायंस) को 300 में से 288 सीटें मिली हैं और विरोधी दलों
के गठबंधन को केवल सात। विरोधी दलों ने चुनाव में धाँधली का आरोप लगाया है और
दुबारा चुनाव की माँग की है, पर अब इन बातों का कोई मतलब नहीं है। उन्हें विचार करना
होगा कि ऐसे परिणाम क्यों आए और उनकी भावी रणनीति क्या हो। मुख्य विरोधी दल
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने 2014 के चुनावों का बहिष्कार करके जो
गलती की थी, उसका भी यह परिणाम है।
विरोधियों की
नेतृत्व-विहीनता भी इन परिणामों में झलक रही है। बीएनपी की मुख्य नेता जेल में है
और उनका बेटा देश के बाहर है। पार्टी पूरी तरह बिखरी हुई है। चुनाव परिणामों के
एकतरफा होने का सबसे बड़ा प्रमाण प्रधानमंत्री हसीना के क्षेत्र दक्षिण पश्चिम
गोपालगंज में देखा जा सकता है, जहाँ शेख
हसीना ने दो लाख 29 हजार 539 वोटों से जीत दर्ज की है। उनके विरोधी बीएनपी के
उम्मीदवार को मात्र 123 वोट मिले। उसका मतलब है कि देश में रुझान इस वक्त एकतरफा
है। यह बात राजनीतिक दृष्टि से खराब भी है। इसके
कारण सत्ता के निरंकुश होने का खतरा बढ़ता है।
