बुधवार, 24 अप्रैल 2019

ब्रेक्जिट के बहाने ब्रिटिश लोकतंत्र के धैर्य की परीक्षा

यूरोपीय संघ और ब्रिटेन के अलगाव यानी ब्रेक्जिट का मसला करीब दो महीने की गहमागहमी के बाद 12 अप्रैल के बजाय 31 अक्तूबर, 2019 तक के लिए टल गया है। अलगाव होना तो 29 मार्च को ही था, पर उससे जुड़े समझौते को लेकर मतभेद इतने प्रबल थे कि वह समय पर नहीं हो पाया और यूरोपीय यूनियन ने उसे 12 अप्रैल तक बढ़ा दिया था। बहरहाल अब यदि 31 अक्तूबर के पहले ब्रिटिश किसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगी, तो अलगाव उससे पहले भी हो सकता है। ब्रसेल्स में 11 अप्रैल को यूरोपीय यूनियन के नेताओं की शिखर वार्ता के बाद इस मसले को छह महीने बढ़ाने का फैसला किया गया, ताकि ब्रिटिश संसद ठंडे दिमाग से कोई फैसला करे। सारा मामला करीब-करीब हाथ से निकल चुका था, पर कॉमन सभा ने अंतिम क्षणों में हस्तक्षेप करके इस अनिश्चय को फिलहाल रोक लिया है।

गत 4 अप्रैल को अंततः एक वोट के बहुमत से संसद ने यह फैसला किया कि ईयू के साथ हुई संधि के अनुच्छेद 50 को लागू करने की तारीख बढ़ाई जाए, ताकि बगैर किसी समझौते के ब्रेक्जिट की सम्भावना को टाला जा सके। इस पूरे मामले में टेरेसा मे की सरकार की फज़ीहत हुई, साथ ही संकटों से निपटने की ब्रिटिश लोकतंत्र की सामर्थ्य पर भी सवाल खड़े हुए हैं। इस मौके पर जरूरत इस बात की थी कि सत्तापक्ष और विपक्ष मिलकर रास्ते निकालते। इस दौरान संसद में तीन बार सरकार की हार हुई, बावजूद इसके कि वह विश्वासमत जीत चुकी थी।

अब सवाल झटके और हलाल का यानी सॉफ्ट या हार्ड ब्रेक्जिट का है। ब्रिटिश उत्तरी आयरलैंड और आयरिश रिपब्लिक के बीच विभाजक रेखा रहेगी या नहीं? क्या इसे सुलझाने के लिए एक और जनमत संग्रह की जरूरत होगी? ऐसे तमाम सवाल अब उठ रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या 23 मई से होने वाले यूरोपीय संसद के चुनावों को लेकर है। अबतक ब्रेक्जिट हो जाता, तो इन चुनावों से बचा जा सकता था। अब ब्रिटिश वोटरों को उस चुनाव में हिस्सा लेना पड़ेगा, जिनसे अलग होने का फैसला वह कर चुका है। इस चुनाव के दौरान देश के अंतर्विरोध और ज्यादा मुखर होंगे तथा समस्या और उलझेगी। कंजर्वेटिव और लेबर दोनों पार्टियों के भीतर दोनों तरह के लोग हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि दोनों का नेतृत्व एक जगह बैठकर विचार करे। फैसला पहले हो गया, तो इस चुनाव से बचा भी जा सकता है।

ब्रेक्जिट ऐसे हो या वैसे समस्या तो सामने आने ही वाली है। बगैर किसी समझौते के यह हुआ, तो अराजकता भयावह होगी। समझौते के साथ हुआ, तब भी होगी, पर कुछ बातें स्पष्ट होने के कारण अपेक्षाकृत कम होगी। फिर भी दोनों को अलग होने में बरसों लगेंगे। तमाम देशों के साथ यूके को नए समझौते करने होंगे, संधियों पर दस्तखत करने होंगे। अंदेशा है कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में एक फीसदी से ज्यादा की गिरावट फौरन आ जाएगी। इसका असर वैश्विक व्यवस्था पर पड़ेगा, जो यों भी सुस्ती की शिकार है।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 122वां जन्म दिवस - नितिन बोस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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