श्रीलंका में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के
बाद वहाँ की संसद ने महिंदा राजपक्षे के प्रति अपना अविश्वास जरूर व्यक्त कर दिया है, पर गतिरोध समाप्त हुआ नहीं
लगता।
सवाल है कि क्या राष्ट्रपति मैत्रीपाला
सिरीसेना इस वोट को मान लेंगे? लगता नहीं। यानी कि केवल इतने से रानिल विक्रमासिंघे को सत्ता वापस मिलने वाली
नहीं है। इसकी दो वजहें हैं। एक, देश की सांविधानिक व्यवस्थाएं अस्पष्ट हैं। सन
2015 के सांविधानिक सुधारों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि संसद और राष्ट्रपति के
रिश्ते किस प्रकार तय होंगे। दूसरे, सुप्रीम कोर्ट ने संसद भंग करने के राष्ट्रपति
के आदेश को स्थगित जरूर कर दिया, पर यह स्पष्ट नहीं किया कि आगे क्या होगा।
संसद अध्यक्ष ने सत्र बुलाया और राजपक्षे के
प्रति अविश्वास प्रस्ताव पास कर दिया। पर इससे प्रधानमंत्री की पुनर्स्थापना नहीं
हो पाई। यानी कि अदालत को फिर
से हस्तक्षेप करना होगा। पर यह भी साफ
है कि महिंदा राजपक्षे के पास भी बहुमत नहीं है। संसद को भंग किया ही इसीलिए गया
था। बुधवार को चली छोटी सी कार्यवाही में राजपक्षे ने उपस्थित होकर इस सत्र की
वैधानिकता को स्वीकार किया, पर उसका बहिष्कार करके यह संकेत भी दिया कि वे आसानी
से हार नहीं मानेंगे। राष्ट्रपति सिरीसेना और राजपक्षे दोनों को समझ में आता है कि
संसद में वे अल्पमत में हैं, वरना वे संसद-सत्र के पाँच दिन पहले ही उसे भंग नहीं
करते।






