बुधवार, 24 अप्रैल 2019

ब्रेक्जिट पर फैसले की आखिरी घड़ी, साँसत में ब्रिटेन

ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से अलग होने में अब एक महीने से कम का समय बचा है और अभी तक तय नहीं है कि यह विलगाव कैसे होगा। धीरे-धीरे लगने लगा है कि देश एक और जनमत संग्रह की ओर बढ़ रहा है। प्रमुख विरोधी दल लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कोर्बिन ने कहा है कि अब इस विषय पर एक और जनमत संग्रह होना चाहिए। उनका कहना है कि यदि हमारे बताए तरीके से अलगाव नहीं हुआ तो हम दूसरे जनमत संग्रह की माँग करेंगे।

उधर प्रधानमंत्री टेरेसा मे ने वायदा किया है कि 12 मार्च तक संसद में इस विषय पर एकबार फिर से मतदान कराने का प्रयास किया जाएगा। खबरें यह भी है कि वे ब्रेक्जिट की तारीख 29 मार्च से खिसका कर आगे बढ़ाने का प्रयास भी कर रही हैं, ताकि बगैर किसी समझौते के ब्रेक्जिट के हालात न बनें। अंदेशा इस बात का है कि ऐसा हुआ तो बड़ी संख्या में मंत्री सरकार से इस्तीफा दे देंगे। जो हालात बन गए हैं, उन्हें देखते हुए लगता नहीं कि ब्रेक्जिट अब सामान्य तरीके से हो पाएगा।

इस मामले को लेकर एक और जनमत संग्रह की बातें काफी पहले से हो रही हैं। ज्यादातर लोगों को समझ में आ रहा है कि देश की जनता को एकबार फिर से सोचने का मौका दिया जाए कि ब्रिटेन का अलग होना ठीक है भी या नहीं और ठीक है, तो क्या वैसे समझौते के साथ होना चाहिए, जो टेरेसा में ने ईयू के साथ किया है? जेरेमी कोर्बिन ने इस बात का समर्थन करके इस सम्भावना को और ताकत दे दी है।

अमेरिका-चीन व्यापार वार्ता का निर्णायक दौर


पिछले साल के अंत में ब्यूनस आयर्स में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन के हाशिए पर हुई वार्ताओं के कारण अमेरिका और चीन के बीच छिड़े व्यापार युद्ध में फिलहाल कुछ समय के लिए विराम लग गया था। तब ह्वाइट हाउस ने घोषणा की थी कि यदि 90 दिन के भीतर दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुँचे, तो चीनी माल पर जो टैरिफ अभी 10 फीसदी है, वह 25 फीसदी हो जाएगा। अमेरिका के अल्टीमेटम का समय पूरा हो रहा है और इन दिनों दोनों देशों के बीच वॉशिंगटन में व्यापार वार्ता फिर शुरू हो गई है। अमेरिका चाहता है कि 1 मार्च से नया समझौता लागू हो और जो भी हो लम्बे समय के लिए हो।

चीन के साथ ही नहीं, इन दिनों ट्रम्प प्रशासन दुनिया के सभी देशों के साथ अपने कारोबारी रिश्तों को पुनर्परिभाषित करने के काम में लगा हुआ है। यानी कि दुनिया की करीब 40 फीसदी अर्थ-व्यवस्था इस नई परिभाषा के दायरे में आने वाली है। रविवार 17 फरवरी को राष्ट्रपति ट्रम्प के पास अमेरिका के वाणिज्य विभाग ने एक प्रस्ताव भेजा है कि देश में ऑटो-आयात को रोका जाए। यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर होगा। यदि यह कदम उठाया गया, तो इसका विपरीत प्रभाव अमेरिका के मित्र देशों पर ही पड़ेगा। इनमें यूरोपीय देशों के अलावा जापान और दक्षिण कोरिया शामिल हैं। सरकार ने अभी इसके बारे में विस्तार से विवरण नहीं दिया है और न यह बताया है कि उसकी रणनीति क्या होगी। जो भी होगा, उसका फैसला मई के मध्य तक करना होगा।

‘ट्विटर-क्रांति’ बनाम ‘ट्विटर-भ्रांति’ और भारत में नकेल डालने की कोशिशें


यों तो समूचा सोशल मीडिया दुधारी तलवार साबित हुआ है, पर इन दिनों भारत में ट्विटर की चर्चा ज्यादा है। बुनियादी वजह राजनीतिक है। लोकसभा चुनाव करीब हैं और हर रंगत की राजनीति अपने चरम पर है। पिछले लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सोशल मीडिया की भूमिका पहली बार बड़े स्तर पर उजागर हुई थी। सन 2013 के अप्रैल महीने में पहले राहुल गांधी के सीआईआई के भाषण और उसके बाद नरेन्द्र मोदी की फिक्की-वार्ता के बाद अचानक अनेक ऐसे हैंडल सामने आए, जिनका रुझान राजनीतिक था। इनमें से ज्यादातर मजाकिया हैंडल थे। उन्हीं दिनों एक रपट थी कि देश के 160 लोकसभा क्षेत्रों में फेसबुक के इतनी बड़ी संख्या में यूज़र हैं और वे परिणामों पर असर डाल सकते हैं।

नया शीत-युद्ध या शांति से पहले का तूफान?

सोवियत संघ के विघटन के बाद नब्बे के दशक में ऐसा लगा था कि शीत-युद्ध खत्म हो गया है, पर हाल की घटनाएं इशारा कर रही हैं कि यह एक नए रूप में फिर से शुरू हो गया है। दुनिया अपनी तार्किक परिणति तक नहीं पहुँची है। उसे कुछ और झटकों की जरूरत है। सीरिया, ईरान, अफगानिस्तान और वेनेजुएला की घटनाओं और अमेरिका-चीन कारोबारी टकराव की बारीकियों पर जाएं, तो जाहिर होगा कि सबके पीछे वही सब है, जो शीत-युद्ध के दौरान होता रहा था। अब अमेरिका और रूस के बीच इंटरमीडिएट रेंज (आईएनएफ़) न्यूक्लियर फ़ोर्स संधि टूट रही है। पहले अमेरिका ने और फिर रूस ने इस संधि को स्थगित करने की घोषणा कर दी है। सन 1987 में हुई इस संधि ने अटलांटिक महासागर के आर-पार के इलाकों में शांति और सुरक्षा का माहौल बनाया था, जो अब खत्म होने लगा है।

पिछले साल 20 अक्तूबर को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि हम इस संधि से हाथ खींच रहे हैं। और अब व्लादिमीर पुतिन ने भी इसी आशय की घोषणा की है। अमेरिका का कहना है कि रूस तो इस संधि का लम्बे अर्से से उल्लंघन करता आया है और इक्कीसवीं सदी में वह कुछ ऐसी मिसाइलों का विकास कर रहा है, जो इस संधि के खिलाफ हैं। इस संधि के तहत दोनों देशों ने 500 से 5,500 किलोमीटर तक की दूरी तक मार करने वाली ऐसी मिसाइलों को त्यागने का फैसला किया था, जिन्हें जमीन से छोड़ा जाता है। इसके बाद दोनों देशों ने करीब 2600 मिसाइलों को नष्ट कर दिया। इस एक कदम से यूरोप में शांति और सुरक्षा का माहौल बन गया।

पूरे दक्षिण एशिया के लिए उम्मीदें जगाती है अफगान शांति-वार्ता

हाल में अफगानिस्तान में शांति-स्थापना के प्रयासों और अमेरिकी सेना की वापसी से जुड़ी खबरों के बीच 9 फरवरी के ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने एक विस्तृत समाचार प्रकाशित किया है कि अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान में तालिबान ठिकानों पर जबर्दस्त हमला बोला है। माना जा रहा है कि सन 2014 के बाद से यह अब तक का सबसे बड़ा हमला है। इन हमलों का उद्देश्य है तालिबान के साथ चल रही शांति-वार्ता में पकड़ अमेरिका के हाथ में रखना। तालिबान को यह भ्रम न रहे कि वे जीत रहे हैं, इसलिए अमेरिका मैदान छोड़कर भाग रहा है। हाल में राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने सालाना ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ भाषण में कहा था कि हम अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने पर विचार कर रहे हैं।

अमेरिका के ताजा हमलों की मार तालिबानी वार्ताकारों के स्वरों में भी सुनाई पड़ रही है। इस वार्ता का संचालन कर रहे अमेरिकी दूत ज़लमय खलीलज़ाद ने हाल में कहा है कि तालिबानियों ने अतीत के अनुभवों से काफी सीख ली है। वे अब अछूत देश बनकर नहीं रहना चाहते। वे यह भी जानते हैं कि इस लड़ाई का सैनिक समाधान सम्भव नहीं है। अफगानिस्तान-अभियान के वर्तमान अमेरिकी सैनिक कमांडर जनरल ऑस्टिन एस मिलर का उद्देश्य तालिबानी ग्रुपों को ज्यादा से ज्यादा तकलीफ पहुँचाना है, ताकि सीधे अमेरिका से बात करने के लिए उनपर दबाव बने।

अफगान सेना की क्षति

पिछले महीने राष्ट्रपति अशरफ गनी ने कहा था कि उन्होंने सन 2014 में जब से कार्यभार सँभाला है, हमारी सेना के 45,000 सैनिक इस लड़ाई में मारे जा चुके हैं। यह संख्या काफी बड़ी है और अब तक बताई जा रही संख्याओं से कहीं ज्यादा है। अफगानिस्तान में सामान्यतः वसंत के बाद लड़ाई तेज हो जाती है और गर्मियों में जबर्दस्त तरीके से होती है। पिछले साल अगस्त में तालिबान ने गज़नी सूबे पर काफी समय तक अपना कब्जा बनाए रखा था। पर इस बार सर्दियों में ही हमले बोलने के पीछे अमेरिकी रणनीति है कि तालिबान सेना को गर्मियों भर इस नुकसान को पूरा करने में ही लगाए रखा जाए।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय भूमिका की परीक्षा

अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी फौजों की वापसी अब लगभग निश्चित है. अमेरिका मानता है कि पाकिस्तानी सहयोग के बिना यह समझौता सम्भव नहीं था. उधर तालिबान भी पाकिस्तान का शुक्रगुजार है. रविवार 10 फरवरी को पाकिस्तान के डॉन न्यूज़ टीवी पर प्रसारित एक विशेष इंटरव्यू में तालिबान प्रवक्ता ज़बीउल्ला मुजाहिद ने कहा कि हम सत्ता में वापस आए तो पाकिस्तान को भाई की तरह मानेंगे. उन्होंने कहा कि इस वक्त अफ़ग़ानिस्तान में जो संविधान लागू है, वह अमेरिकी हितों के अनुरूप है. हमारा शत-प्रतिशत मुस्लिम समाज है और हमारा संविधान शरिया पर आधारित होगा.

इसके पहले 6 फरवरी को मॉस्को में रूस की पहल पर हुई बातचीत में आए तालिबान प्रतिनिधियों ने कहा कि हम समावेशी इस्लामी-व्यवस्था चाहते हैं, इसलिए नया संविधान लाना होगा. तालिबानी प्रतिनिधिमंडल के नेता शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकज़ाई ने कहा कि काबुल सरकार का संविधान अवैध है. उसे पश्चिम से आयात किया गया है. वह शांति के रास्ते में अवरोध बनेगा. हमें इस्लामिक संविधान लागू करना होगा, जिसे इस्लामिक विद्वान तैयार करेंगे.

सवाल है कि अफ़ग़ानिस्तान की काबुल सरकार को मँझधार में छोड़कर क्या अमेरिकी सेना यों ही वापस चली जाएगी? पाकिस्तानी सेना के विशेषज्ञों को लगता है कि अब तालिबान शासन आएगा. वे मानते हैं कि तालिबान और अमेरिका के बीच बातचीत में उनके देश ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई है और इसका पुरस्कार उसे मिलना चाहिए. अख़बार ‘दुनिया’ में प्रकाशित एक आलेख के मुताबिक़ पाकिस्तान ने तालिबान पर दबाव डाला कि वे अमेरिका से बातचीत के लिए तैयार हो जाएं. इस वक्त वह ऐसा भी नहीं जताना चाहता कि तालिबान उसके नियंत्रण में है. अलबत्ता अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान की सरकार को आश्वस्त किया है कि हम उसे मँझधार में छोड़कर जाएंगे नहीं. अमेरिका शुरू से मानता रहा है कि तालिबान को पाकिस्तान में सुरक्षित पनाह मिली हुई है.

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

लाहौर में इस साल भी नहीं मनेगा बसंत, पर चर्चा जरूर है


http://epaper.navjivanindia.com//imageview_257_173242334_4_71_03-02-2019_i_1_sf.html
जिस तरह भारत में सांस्कृतिक सवालों पर आए दिन धार्मिक कट्टरता के सवाल उठते हैं तकरीबन उसी तरह पाकिस्तान में भी उठते हैं। दक्षिण एशिया के समाज में तमाम उत्सव और समारोह ऐसे हैं, जो धार्मिक दायरे में नहीं बँधे हैं। वसंत पंचमी या श्रीपंचमी ऐसा ही मौका है, जो ऋतुओं से जुड़ा है। इसे भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान में अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है। पीला या बसंती रंग इसकी पहचान है और इसे मनाने के अलग-अलग तरीके हैं। पंजाब में बसंत के दिन पतंगे उड़ाने की परम्परा है। विभाजन के बाद भी यह परम्परा चली आ रही है, पर पिछले कुछ वर्षों से पाकिस्तान बसंत के उत्सव पर रोक लगी हुई है। वहाँ की पंजाब सरकार ने पतंगबाजी से पैदा होने वाले खतरों को लेकर इसपर रोक लगा रखी है, पर काफी लोग मानते हैं कि इस त्योहार की हिन्दू पहचान को लेकर सवालिया निशान खड़े हुए थे, जो पाबंदी की असली वजह है।  

भारत में मुगल बादशाहों ने बसंत को सांस्कृतिक रूप से स्वीकार किया था और उसे बढ़ावा दिया था। मुग़ल काल की मिनिएचर पेंटिंग में बसंत-उत्सव की झलक मिलती है। महाराजा रंजीत सिंह ने अपने दौर में बसंत के दौरान दस दिन की छुट्टी घोषित कर रखी थी। उनके सैनिक इस दौरान पीले रंग के वस्त्र पहनते थे। बँटवारे के बाद पाकिस्तानी पंजाब में भी पतंग उड़ाने का रिवाज़ बना रहा। बल्कि हुआ यह कि अस्सी के दशक में भारत के मुकाबले पाकिस्तानी समाज में पतंगबाजी ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर गई। इसकी एक वजह शायद पाकिस्तानी समाज के अंतर्विरोध थे। वह ज़ियाउल हक़ का दशक भी था, जब साहित्य, कला और संस्कृति को धार्मिक-दृष्टि से देखना शुरू हुआ। मनोरंजन पर पाबंदियाँ लगीं, जिसमें फ़िल्म और रंगमंच भी शामिल थे। सैनिक सरकार और पाबंदियों के उस दौर में लोगों को मनोरंजन और तफरीह का एक रास्ता बसंत की शक्ल में नजर आया। इसके केन्द्र में थी, पतंगबाजी।
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...