रविवार, 26 मई 2019

विदेश-नीति के चार आयाम


बदलते वैश्विक-परिदृश्य में नई सरकार की चुनौतियाँ
अगले कुछ दिनों में देश की नई सरकार का गठन हो जाएगा। देश इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करने वाला है। हमारे लोकतंत्र की विशेषता है कि उसमें निरंतरता और परिवर्तन दोनों के रास्ते खुले हैं। विदेश-नीति ऐसा क्षेत्र है, जिसमें निरंतरता और प्रवाह की जरूरत ज्यादा होती है। सन 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के काफी पहले हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व ने भावी विदेश-नीति के कुछ बुनियादी सूत्रों को स्थिर किया था, जो किसी न किसी रूप में आज भी कायम हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है असंलग्नता की नीति। हम किसी के पिछलग्गू देश नहीं हैं, और किसी से हमारा स्थायी वैर भी नहीं है। अपने आकार, सांस्कृतिक वैभव और भौगोलिक महत्व के कारण हम हमेशा दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में गिने गए।
सच यह है कि हम विदेश-नीति से जुड़े मसलों को कॉज़्मेटिक्स या बाहरी दिखावे तक ही महत्व देते हैं। उसकी गहराई पर नहीं जाते। हाल में हुए लोकसभा-चुनाव में पुलवामा से लेकर मसूद अज़हर का नाम कई बार लिया गया, पर विदेश-नीति चुनाव का मुद्दा नहीं थी। इसकी बड़ी वजह यह है कि विदेश-नीति का आयाम हम राष्ट्रीय-सुरक्षा के आगे नहीं देखते हैं। आर्थिक-विकास भी काफी हद तक विदेश-नीति से जुड़ा है। गोकि हमारी अर्थ-व्यवस्था चीन की तरह निर्यातोन्मुखी नहीं है, फिर भी बेरोजगारी, सार्वजनिक स्वास्थ्य, परिवहन, आवास, विज्ञान और तकनीक जैसे तमाम मसलों का विदेश-नीति से रिश्ता है।
भारत जैसे देशों के सामने सवाल है कि आर्थिक विकास, व्यक्तिगत उपभोग और गरीबी उन्मूलन के बीच क्या कोई सूत्र है? पिछले डेढ़-दो सौ साल में दुनिया की समृद्धि बढ़ी, पर असमानता कम नहीं हुई, बल्कि बढ़ी। ऐसा क्यों हुआ और रास्ता क्या है? सन 2015 का सहस्राब्दी लक्ष्यों के पूरा होने का साल था। उन्नीसवीं सदी के अंत में संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले दुनिया ने लोगों को दरिद्रता के अभिशाप से बाहर निकालने का संकल्प किया था। वह संकल्प पूरा नहीं हो पाया। अब उसके लिए सन 2030 का लक्ष्य रखा गया है।

सोमवार, 13 मई 2019

‘सायबर-युद्ध’ के द्वार पर खड़ी दुनिया


शनिवार 4 मई को इसराइली सेना ने गज़ा पट्टी में हमस के ठिकानों पर जबर्दस्त हमले किए। हाल के वर्षों में इतने बड़े हमले इसराइल ने पहली बार किए हैं। हालांकि लड़ाई ज्यादा नहीं बढ़ी, महत्वपूर्ण बात यह थी कि इन इसराइली हमलों में दूसरे ठिकानों के अलावा हमस के सायबर केन्द्र को निशाना बनाया गया। हाल में हमस ने सायबर-स्पेस पर हमले बोले थे। सायबर-अटैक के खिलाफ जवाबी प्रहार का यह दूसरा उदाहरण है। इसके पहले अगस्त 2015 में अमेरिका ने ऐसे कारनामे को अंजाम दिया था। इस लिहाज से इसराइली हमला इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। अब हम सायबर-युद्ध के और करीब पहुँच गए हैं।


अभी तक हम मानकर चल रहे थे कि सायबर हमले केवल कम्प्यूटर सिस्टम्स को निशाना बनाते हैं। लक्ष्य होता है शत्रु की अर्थ-व्यवस्था तथा तकनीकी सिस्टम्स को ध्वस्त करना। आमतौर पर इसे भौतिक-युद्ध से फर्क अदृश्य-युद्ध का अंग माना जाता है। पर शनिवार 4 मई को इसराइली सेना ने गज़ा पट्टी में हमस के ठिकानों पर जबर्दस्त हमले किए। हाल के वर्षों में इतने बड़े हमले इसराइल ने पहली बार किए हैं और इनमें निशाना दूसरे ठिकानों के अलावा हमस के सायबर केन्द्र हैं। इन केन्द्रों से हाल में हमस ने इसराइल के सायबर-स्पेस पर हमले बोले थे। सायबर-वार के खिलाफ जवाबी प्रहार का यह दूसरा उदाहरण है। इसके पहले सन 2015 में अमेरिका ने ऐसे कारनामे को अंजाम दिया था।
मनुष्य जाति का अस्तित्व प्रकृति के साथ युद्ध करते-करते कायम हुआ है। मानवता का इतिहास, युद्धों का इतिहास है। युद्ध की तकनीक और उपकरण बदलते रहे हैं। तीन साल पहले नेटो ने घोषित किया था कि भविष्य की लड़ाइयों का मैदान सायबर स्पेस होगा। इस लिहाज से शनिवार को हुआ इसराइली हमला  इतिहास की महत्वपूर्ण घटना है। अब हम सायबर-युद्ध के और करीब पहुँच गए हैं। इसराइली रक्षा-विशेषज्ञों का दावा है कि हाल में हमस ने इसराइल पर सायबर हमला बोला था, जिसमें वे विफल रहे। इसके जवाब में हमने हमस के सायबर केन्द्र को तबाह कर दिया है।
इसराइल ने इस बात का ज्यादा विवरण नहीं दिया है कि हमस ने सायबर हमला कब और किस तरह से किया, पर यह साफ कहा कि यह सायबर हमला था, जिसका जवाब हमने हवाई हमले से किया। इसराइल के इस हमले में खुफिया एजेंसी शिन बेट भी शामिल थी, जिसे इसराइल की अदृश्य एजेंसी माना जाता है। अगस्त 2015 में अमेरिका ने ब्रिटिश नागरिक जुनैद हुसेन की हत्या के लिए सीरिया के रक्का में ड्रोन हमला किया था। जुनैद हुसेन इस्लामिक स्टेट का सायबर एक्सपर्ट था, जिसने अमेरिका सेना के कुछ भेद ऑनलाइन उजागर कर दिए थे। माना जाता है कि वह सायबर वॉर की शुरुआत थी। इसराइल और हमस के बीच लगातार चल रहे रॉकेट युद्ध के बीच के बीच इस परिघटना से भावी युद्धों के संकेत मिलने लगे हैं।

उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण

अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच आए दिन नोकझोंक के क्रम में पिछले हफ्ते अचानक तल्खी आ गई। उत्तर कोरिया ने अपने सुप्रीमो किम जोंग की निगरानी में एक के बाद अनेक कम दूरी के मिसाइल पूरब की ओर दागे, जो समुद्र में जाकर गिरे। शनिवार 4 मई को किए गए इन परीक्षणों से हालांकि अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि ये तो शॉर्ट रेंज मिसाइल हैं, इनसे हमें कोई खतरा नहीं है, पर इनसे उत्तर कोरिया के पड़ोसी परेशान हैं। इसका मतलब है कि अमेरिकी धमकियों के बावजूद उत्तर कोरिया अपनी मिसाइल तकनीक में उत्तरोत्तर सुधार कर रहा है। सुधार नहीं भी कर रहा है, तब भी अमेरिका को परेशान करने वाली कोई न कोई हरकत कर ही रहा है। उत्तरी कोरिया ने पिछले साल के शुरू में हुई एक सैनिक परेड में शॉर्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों और मल्टीपल रॉकेट लांचरों का प्रदर्शन किया था।

उत्तर कोरिया की सरकारी समाचार सेवा केसीएनए ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि इस अभ्यास का उद्देश्य विदेशी आक्रमण की स्थिति में उत्तर कोरिया की तैयारियों को परखना था। इन परीक्षणों के साथ ही किम जोंग ने अपने सैनिकों से कहा है कि इस बात को दिमाग़ में रखें कि वास्तविक शांति और सुरक्षा की गारंटी सिर्फ़ ताक़तवर बल ही दे सकते हैं। खबरों के मुताबिक उत्तर कोरिया के होदो प्रायद्वीप से छोटी दूरी की मिसाइलें जापानी सागर में दागी गईं। पिछले महीने भी उत्तरी कोरिया ने एक गाइडेड मिसाइल का परीक्षण किया था।

शनिवार, 4 मई 2019

शांति के द्वार पर अफ़ग़ानिस्तान और लोया जिरगा


अफ़ग़ानिस्तान में शांति-स्थापना की दिशा में गतिविधियाँ जैसे-जैसे तेजी पकड़ रहीं हैं वैसे-वैसे इस प्रक्रिया के अंतर्विरोध भी सामने आ रहे हैं। दिसम्बर में अमेरिकी मीडिया ने खबर दी थी कि राष्ट्रपति ट्रम्प ने पैंटागन से कहा है कि वे अप्रैल तक अफगानिस्तान में सैनिकों की संख्या 14,000 से घटाकर 7,000 कर दें। बाद में हालांकि अमेरिका सरकार ने इस बात का खंडन भी किया, पर बात कहीं न कहीं सच थी। अप्रैल गुजर चुका है, सेना की वापसी नहीं हुई है, पर घटनाक्रम बड़ी तेजी से बदल रहा है।
सबसे बड़ी घटना है सोमवार से शुरू हुआ लोया जिरगा, यानी अफ़ग़ान नेतृत्व का महाधिवेशन। इसके समांतर अमेरिका-पाकिस्तान-तालिबान की बातचीत चल रही है और साथ ही अमेरिका-चीन-रूस संवाद भी। कुछ समय पहले अमेरिकी दूत ज़लमय ख़लीलज़ाद ने कहा था, हमें उम्मीद है कि इस साल जुलाई में अफगान राष्ट्रपति के चुनाव के पहले ही हम समझौता कर लेंगे। इसके पहले उन्होंने उम्मीद जताई थी कि समझौता अप्रैल तक हो जाएगा। फिलहाल लगता नहीं कि जुलाई तक समझौता हो पाएगा, पर कुछ न कुछ हो जरूर रहा है।

मसूद अज़हर पर चीनी अड़ंगा हटने से हालात बदलेंगे

चीन ने मसूद अज़हर के मामले पर सुरक्षा परिषद के एक प्रस्ताव पर लगाई अपनी आपत्ति हटा ली है। इसके बाद मसूद अज़हर अब घोषित आतंकवादी है। चीन-भारत रिश्तों के लिहाज से यह महत्वपूर्ण घटना है साथ ही पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों पर भी इसका असर पड़ेगा। इमरान खान की हाल की चीन यात्रा के दौरान शी चिनफिंग ने इस बात की उम्मीद जाहिर की कि पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्तों में सुधार होगा। दक्षिण एशिया की प्रगति और विकास के लिए यह जरूरी भी है। दक्षिण एशिया के देशों के बीच सम्पर्क तबतक ठीक नहीं होगा, जबतक भारत और पाकिस्तान के रिश्ते बेहतर नहीं होंगे। फरवरी में पुलवामा कांड के बाद चीन ने अपने उप विदेश मंत्री शुआनयू को पाकिस्तान भेजा था, ताकि तनाव बढ़ने न पाए। चीन को लेकर भारत में एक खास तरह की चिंता हमेशा रहती है। पकिस्तान के प्रति उसका झुकाव बी जाहिर है। क्या वह अपने इस झुकाव को कम करेगा? क्या वह संतुलन स्थापित करेगा? लोकसभा चुनाव के बाद ऐसे सवाल फिर से विमर्श का विषय बनेंगे।

इस बीच चीन ने अरबों डॉलर की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड परियोजना से बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे को हटा दिया है। बीसीआईएम को हटाए जाने के कारणों के बारे में तत्काल कुछ नहीं बताया गया है, लेकिन अप्रैल के अंतिम सप्ताह में आयोजित बेल्ट एंड रोड फोरम के दूसरे शिखर सम्मेलन में जारी सूची में जिन परियोजनाओं का जिक्र किया गया है, उनमें इस गलियारे का उल्लेख नहीं है। भारत ने बेल्ट एंड रोड के तहत बन रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का विरोध करते हुए इस कार्यक्रम से अपनी दूरी बना रखी है और इसके दूसरे सम्मेलन में भी उसने भाग नहीं लिया। अनुमान लगाया जा सकता है कि इस विरोध की खीझ में चीन ने बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार आर्थिक गलियारे (बीसीआईएम) को लिस्ट से बाहर कर दिया है।

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

श्रीलंका में दाएश का हमला समूचे भारतीय-भूखंड के लिए सबक और चेतावनी


सीरिया में पिटाई के बाद लगता था कि इस्लामिक स्टेट कहीं न कहीं सिर उठाएगा। उसे अपनी उपस्थिति का एहसास कराना है। श्रीलंका में रविवार को हुई हिंसा की जिम्मेदारी लेकर उसने इस बात को साबित किया है। अभी तक दक्षिण एशिया उसके निशाने से बचा हुआ था। यों 2016 में बांग्लादेश की घटनाओं के बाद कहा गया था कि वहाँ इस्लामिक स्टेट जड़ें जमा रहा है। कश्मीर घाटी में अक्सर उसके काले झंडे नजर आते हैं। फिर भी इस्लामिक स्टेट के खतरे को बहुत गम्भीरता से नहीं देखा गया। श्रीलंका की हिंसा भारत के लिए ही नहीं दक्षिण एशिया के सभी देशों के लिए चेतावनी है।
श्रीलंका में तकरीबन दस साल से चली आ रही शांति जिस भयानक हत्याकांड से भंग हुई है, वह समूचे भारत-भूखंड के लिए खतरे की घंटी है। दुनिया की सबसे बहुरंगी-बहुल संस्कृति वाला समाज इसी इलाके में रहता है। करीब तीन दशक तक चले तमिल-गृहयुद्ध के बाद उम्मीद थी कि श्रीलंका के निवासी जातीय-साम्प्रदायिक आधारों पर अपने आपको बाँटने के बजाय सामूहिक सुख-समृद्धि के रास्ते तैयार करेंगे। इन कोशिशों को तोड़ने के प्रयास अब फिर शुरू हो गए हैं। बहरहाल श्रीलंका की प्रशासनिक-व्यवस्था ने इस हिंसा के बाद सम्भावित टकराव को रोकने में सफलता हासिल की है।

सूडान में फौजी शासकों पर जनता का भारी दबाव

सूडान में लोकतांत्रिक आंदोलन अपनी तार्किक परिणति की ओर बढ़ रहा है। पिछले कुछ महीनों से चल रहे आंदोलन के बाद 32 साल से कुर्सी पर जमे बैठे सूडान के स्वयंभू शासक उमर अल-बशीर को गद्दी छोड़नी पड़ी है, पर उनके स्थान पर फौजी कौंसिल ने सत्ता हथिया ली है। देश की युवा आबादी आंदोलन की अगली कतार में खड़ी है और सेना पर लगातार दबाव बना रही है कि वह भी रास्ते से हटे। सेना के साथ नागरिकों की लगातार बातचीत चल रही है। सेना ने तत्काल नागरिक शासन की उनकी मांग को मानने से इनकार कर दिया है, जिसके कारण पिछले रविवार को बातचीत एक मोड़ पर आकर ठहर गई है।

जनता के प्रतिनिधियों का कहना है कि सेना नागरिक परिषद को सत्ता सौंप दे। आंदोलनकारी सूडानी प्रोफेशनल्स एसोसिएशन (एसपीए) के प्रवक्ता मोहम्मद अल-अमीन ने सेना परिसर में जमा हजारों प्रदर्शनकारियों की भीड़ को बताया कि हम फौजी कौंसिल के साथ अपनी बातचीत स्थगित कर रहे हैं, पर हमारा धरना-प्रदर्शन जारी रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि हमारी लड़ाई खत्म नहीं हुई है, क्योंकि फौजी कौंसिल बशीर की बेदखल सरकार से कोई खास अलग नहीं है। फौजी अफसरों की दिलचस्पी लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने में नहीं है।

देश के नए फौजी शासक लेफ्टिनेंट जनरल अब्देल फ़तह अल-बुरहान ने रविवार को सरकारी टेलीविजन पर कहा कि हम जनता के हाथों में सत्ता सौंपने को तैयार हैं, पर अराजकता के इस दौर में नहीं। अभी व्यवस्था को कायम होने देना चाहिए। हमें सत्ता को कोई मोह नहीं है, हम इससे चिपके नहीं रहेंगे। हम चाहते हैं कि आंदोलनकारी कोई ऐसा प्रस्ताव पेश करें, जिसे स्वीकार किया जा सके।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सैनिक नेतृत्व की दरअसल हमारी बातों में दिलचस्पी है ही नहीं। इसमें शामिल लोग वही हैं, जो अब तक सत्ता में बैठे थे। वे नई व्यवस्था क्यों चाहेंगे? हमारे पास अब आंदोलन को तेज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अमेरिका की उस सूची में सूडान का नाम भी है, जिसमें आतंकवादी देशों के नाम दर्ज हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि फौजी शासन हटे, तो इस सूची से सूडान का नाम हट सकता है। इस सिलसिले में बातचीत के लिए सूडानी नागरिकों का एक दल अमेरिका जाने वाला है। सूडान के इस आंदोलन को अमेरिकी मीडिया का समर्थन भी मिल रहा है।

हालांकि प्रदर्शनकारियों में बहुत से नौजवान इस बात से खुश हैं कि फौजी शासक जनता को सत्ता सौंपने को तैयार हैं, पर उनके समझदार नेताओं का कहना है कि ये बातें समय काटने और भरमाने के लिए की जा रही हैं। सेना इस बात के लिए भी तैयार है कि किसी असैनिक को देश का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया जाए, पर वह सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी छोड़ने को तैयार नहीं है। आंदोलनकारी इस मामले में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की मदद लेने को तैयार भी नहीं हैं। इन दोनों देशों ने तीन अरब डॉलर की सहायता देने की पेशकश की है। इसपर आंदोलनकारियों ने कहा कि हमें सऊदी समर्थन नहीं चाहिए। आप अपना पैसा अपने पास रखें। अल जजीरा ने एक स्थानीय कारोबारी को उधृत किया है कि हम अपने देश का निर्माण अपने साधनों से कर लेंगे। हमें अच्छा नेतृत्व चाहिए विदेशी सहायता नहीं। जिस वक्त उमर अल-बशीर हमारे लोगों की हत्या कर रहा था, तब ये देश क्यों नहीं बोले?

इसके पहले सऊदी अरब और यूएई ने कहा था कि हम 50 करोड़ डॉलर सूडान के केन्द्रीय बैंक में जमा कर देंगे, जिससे सूडानी पौंड पर दबाव कम हो जाएगा और मुद्रा-विनिमय की दिक्कतें दूर हो जाएंगी। सहायता से जुड़ी शेष धनराशि भोजन, औषधियों, ईंधन वगैरह पर खर्च की जा सकती है। आंदोलनकारियों को लगता है कि यह सब फौजी शासन को बचाने की चाल है।
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