बुधवार, 24 अप्रैल 2019

मालदीव के संसदीय चुनावों में भी एमडीपी की भारी जीत

मालदीव के संसदीय चुनाव में मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी (एमडीपी) की भारी जीत से भारत ने संतोष की साँस ली है। मालदीव के राष्ट्रपति इब्राहीम मोहम्मद सोलिह की सरकार के लिए भी यह खुशखबरी है, क्योंकि अब तमाम विधेयकों और नीति से जुड़े प्रस्तावों को संसद से मंजूरी मिलने में आसानी होगी। सितम्बर 2018 में हुए चुनाव में जीतने के बाद से राष्ट्रपति सोलिह का ध्यान देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने और चीनी कर्जे के दबाव से बाहर निकालने में है। भारत की दिलचस्पी हिन्द महासागर में अपनी सुरक्षा को मजबूत बनाने में है। मालदीव में मित्र-प्रशासनिक व्यवस्था के आने से बेहतर और क्या हो सकता है।

पिछले साल हुए राष्ट्रपति पद के चुनावों में पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की पराजय के बाद भी अंदेशा इस बात का था कि कहीं संसदीय चुनाव में ऐसी स्थिति पैदा न हो जाए कि देश में राजनीतिक गतिरोध पैदा होने लगे। राष्ट्रपति पद के चुनाव में कई दलों ने मिलकर मोर्चा बनाकर अब्दुल्ला यामीन को पराजित किया था, पर इन दलों के बीच मतैक्य नहीं है और कुछ दलों की हमदर्दी अब्दुल्ला यामीन के साथ है। बहरहाल इस संसदीय चुनाव में यामीन खुद नहीं उतरे थे। उनकी पार्टी प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ मालदीव ने अपने प्रत्याशी उतारे थे, पर उनकी भारी पराजय हुई। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद को भारी जीत मिली।

मालदीव की आंतरिक राजनीति में भारत की दिलचस्पी इसलिए है, क्योंकि पिछले सात-आठ साल से दोनों देशों के रिश्तों में खलिश पैदा हो गई थी। इस खलिश के पीछे चीन की भूमिका थी। माना जाता है कि भारत को घेरने की चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ नीति का एक अहम केन्द्र मालदीव भी है। पिछले कुछ वर्षों के भीतर चीन ने यहाँ काफी पैसा लगाया है और देश के इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव के चक्कर में इसके कई द्वीपों पर अपना जाल फैला लिया है। पश्चिमी विश्लेषक मानते हैं कि यदि मालदीव इसी दिशा में आगे बढ़ता रहता तो वह चीन का भारी कर्जदार बन जाता।

चीनी कर्जदार

चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना का एक बड़ा दुष्परिणामों यह उभर कर आया है कि छोटे-छोटे देश अपने विकास की हड़बड़ी में कर्जदार बनते जा रहे हैं। बदले में चीन उनसे फौजी सुविधाएं हासिल कर लेता है। इस प्रकार दुनिया पर प्रभुत्व जमाने की भावी चीनी परियोजना का यह महत्वपूर्ण पहलू है। बहरहाल राष्ट्रपति सोलिह की पार्टी मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी ने संसद में दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर लिया है। कुल मिलाकर 87 सदस्यों वाली संसद में एमडीपी को 65 सीटों पर विजय मिली है।

हाल के वर्षों में भारतीय कड़वाहट की वजह वहाँ की अब्दुल्ला यामीन सरकार थी। इस सरकार पर लोकतांत्रिक मूल्यों मान्यताओं को तिलांजलि देने का आरोप था। मालदीव में जेहादी राजनीति का उभार हो रहा था, जिसे लेकर अमेरिका तक को चिंता है। पिछले साल मार्च में पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल कमर बाजवा के मालदीव दौरे ने इस संदेह को पुष्ट किया था कि वहाँ चीन-पाकिस्तान गठजोड़ से खिचड़ी पक रही है। इसके ठीक पहले फरवरी में देश में आपातकाल की घोषणा करके विरोधियों की धर-पकड़ ने खतरनाक रूप अख्तियार कर लिया था। हस्तक्षेप करने वाले सुप्रीम कोर्ट के जजों को भी जेल में डाल दिया गया था। मालदीव में ऐसा माहौल 2012 के बाद बना, जब भारत-समर्थक मोहम्मद नाशीद का तख्ता पलट कर नई सरकार आई। इस सरकार ने चीन और पाकिस्तान समर्थक नीतियों को अपनाया। सन 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग वहाँ की यात्रा पर आए।

भारत-विरोधी गतिविधियां

सितम्बर में हुए चुनाव के बाद वहाँ सत्ता-परिवर्तन हुआ। नए राष्ट्रपति के शपथ-ग्रहण में भारतीय प्रधानमंत्री भी शामिल हुए थे। हाल के वर्षों में चीन ने हिन्द महासागर में नौसैनिक गतिविधियाँ बढ़ाई हैं, जिसमें मालदीव एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो रहा था। पिछले साल उसने उत्तरी अफ्रीका के देश जिबूती में अपना फौजी अड्डा स्थापित किया, तो भारत के कान खड़े हुए। मालदीव और श्रीलंका में खासतौर से सक्रियता बढ़ाई। गौर करने वाली बात है कि सन 2011 तक मालदीव में चीन का दूतावास भी नहीं था। अब उसका इस देश के साथ फ्री-ट्रेड का समझौता है। ऐसा समझौता भारत के साथ नहीं है, जबकि मालदीव के हर संकट में सबसे पहले भारत ही आगे आकर मदद करता रहा है। इस दौरान मालदीव में चीन ने इंफ्रास्ट्रक्चर की कई बड़ी योजनाएं हथिया लीं, भारतीय कम्पनियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया। अब यह देश चीन का करीब डेढ़ अरब डॉलर का कर्जदार है, जो देश की जीडीपी का करीब एक चौथाई है।

संसदीय चुनावों के जो परिणाम आए हैं, उनमें पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नाशीद की जीत सबसे महत्वपूर्ण है। नाशीद को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने का श्रेय जाता है। उन्होंने भारत के साथ रिश्तों को भी बेहतर बनाया था, पर सन 2012 में उनका तख्ता पलट दिया गया, जिसमें देश की सेना और न्यायपालिका ने उनके विरोधियों का साथ दिया था। सन 2015 में नाशीद को 13 साल कैद की सज़ा सुनाई गई थी। एक साल जेल में रहने के बाद नाशीद इलाज के लिए ब्रिटेन चले गए। पिछले साल राष्ट्रपति के चुनाव में यामीन की पराजय के बाद वे देश लौटे। इसके बाद देश की सुप्रीम कोर्ट ने उनपर लगे आरोपों को खारिज किया। नाशीद को पिछले साल राष्ट्रपति पद के चुनावों में खड़ा होने नहीं दिया गया था, क्योंकि उन्हें अदालत से सज़ा मिली थी। इब्राहीम सोलिह उनके साथ उप राष्ट्रपति पद पर रहे थे।

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